है दम तो करो दावा
जमीन के चंद टुकड़ों पर कब्जा करके
समझ रहे हो खुद को मालिक इस जहां का,
लटके पड़े हैं बड़े बड़े गोले आसमानों में
क्या बन सकते हो मालिक वहां का,
अपनी सोच से आगे भी सोचने की कोशिश करो,
सिमट के बैठे हो पुरानी तुच्छ मान्यता ले
चांद से चंद चांदनी अमावस में
एक बार दो बार बार बार नोचने की कोशिश करो,
अपने ग्रंथों पर ही अटके हो जाते क्यों नहीं आगे,
इंसान इंसान क्यों नहीं लगता
या लपेटने की क्षमता नहीं रखते तुम्हारे कच्चे धागे,
यूं ही कहते फिरते हो कि
सभी बंध जाते हैं बांधे गए बंधन में,
या सिर्फ लाभ देख लिपटने की हुनर है
जैसे लिपटा हुआ भुजंग है चंदन में,
प्रकृति को भी मजबूर कर चुके हो रोने के लिए,
क्या चार गज जमीं काफी नहीं तुझे सोने के लिए,
प्राणदायी वायु खो रहे हो
बचा नहीं पा रहे पानी मुंह धोने के लिए,
पीढ़ी बढ़ाये जा रहे हो
क्या भविष्य में खुद को खोने के लिए,
है दम तो करो दावा चांद सूरज पर,
यदि नहीं तो न इतराओ
लुटे गये संपत्ति और सूरत पर।
— राजेन्द्र लाहिरी
