अनमोल रिश्ते
समय कितना बदल रहा है ! पहले माता पिता शादियां तय करते थे फिर संतान के मोह में लिव-इन रिलेशनशिप को भी स्वीकार करने लगे ।
उस दिन तो समीर ने सारी हदें पार कर दी थी । मुझे तो पता ही नहीं चलता अगर पापा समीर को किसी दूसरी लड़की के साथ होटल के कमरे से निकलते ना देख लेते । वह उसके पास पहली बार आये थे और आते ही पूछ बैठे–“पाखी तुम्हें पता है समीर इस वक्त कहां और किसके साथ है ?”
“सर…र…ररर कहते हुए वह हकलाने लगी ।”
“मेरे बेटे के साथ कितने वर्षों से रह रही हो और मुझे पापा कहने में संकोच क्यों कर रही हो ?”
“जीईईई…पापा मुझे माफ कर दिजिये ।”
“बेटी; माफी मांगने का वक्त नहीं है बल्कि जागने का वक्त है। मैं समीर को भी बुलाया हूँ, चलो बात करते हैं।
“पापा आप अचानक क्यों बुलाये ?”
संयत स्वर में पापा बोले– “तुम और पाखी शादी कर लो, लिव-इन में कई सालों से रह रहे हो ।”
“सॉरी पापा मेरी आंखें खूल गई हैं अब मैं ओपन रिलेशनशिप में विश्वास करता हूँ ।”
झन्नाटेदार थप्पड़ की आवाज सुन वह चौंक गई थी । फिर भी पापा के स्वर संयमित थे ।
“मेरी नज़रों से दूर हो जाओ, आज के दिन मैं बेटा खोकर बेटी पा लिया हूँ । अब उसे सहारा देकर उसके अरमानों और सपनों को पंख मैं दूंगा।”
स्टेज पर उसका नाम पुकारा जा रहा था ।
“पाखी भारद्वाज ; आपको इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ सहायक प्रबंधक का अवार्ड दिया जा रहा है ।”
अवार्ड लेने से पहले पापा दिख गये, माईक हाथ में लेकर पापा को स्टेज पर बुलाई ।
सभी सदस्य उसे दो शब्द कहने का अनुरोध करने लगे।
“आयोजन में उपस्थित सभी सदस्यों को यह बताते हुए मुझे अपार खुशी हो रही है कि रास्ते के कंकड़-पत्थरों को उछालते अक्सर कई लोग राह में दिख जायेंगे, मगर उसके सपनों को बिरले ही पंख दे पाते हैं , मुझे गर्व है अपने पापा पर ।”
— आरती रॉय
