कुछ तो कहो
मैं शब्द चुनूँ,
तुम मौन रहो
भली लगे न यह रीत।
कुछ तो कह दो,
कुछ तो गह लो,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।
मैं भी इठलाऊँ,
मैं भी इतराऊँ,
झूम-झूम लज जाऊँ।
गढ़ लो मुझ पर,
सखे, कुछ गीत॥
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।
रक्तिम आनन,
खनके कंगन,
पायल छन-छन,
दृग में अंजन,
काया कंचन
तब बनो प्रिये मीत,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।
मन हार चुकी,
सब वार चुकी,
कर-कर श्रृंगार
सँवार चुकी।
हरकर मुझको
तुम लेना जीत,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।
कुछ तो कहो,
मेरे मनमीत—
भली लगे न रीत!
उफ़्फ़! कैसी
तेरी प्रीत…!
— सविता सिंह ‘मीरा’
