कविता

कुछ तो कहो

मैं शब्द चुनूँ,
तुम मौन रहो
भली लगे न यह रीत।
कुछ तो कह दो,
कुछ तो गह लो,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।

मैं भी इठलाऊँ,
मैं भी इतराऊँ,
झूम-झूम लज जाऊँ।
गढ़ लो मुझ पर,
सखे, कुछ गीत॥
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।

रक्तिम आनन,
खनके कंगन,
पायल छन-छन,
दृग में अंजन,
काया कंचन
तब बनो प्रिये मीत,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।

मन हार चुकी,
सब वार चुकी,
कर-कर श्रृंगार
सँवार चुकी।
हरकर मुझको
तुम लेना जीत,
हाय! जता दो प्रीत!
सुन तो जरा मनमीत।

कुछ तो कहो,
मेरे मनमीत—
भली लगे न रीत!
उफ़्फ़! कैसी
तेरी प्रीत…!

— सविता सिंह ‘मीरा’

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com