कविता

हाथ मिला

हाँ,
यदि दम है तो हाथ मिला।
हमें गले लगा,
हमें हँसा, खिलखिला।
चाय नहीं तो
कम से कम
अपने घर
पानी पिला।
मगर
आपके रवैये से
हम निराश हैं,
इंसानियत के लिए
इंसानों से ही
हताश हैं।
कहो,
सचमुच मिट गया है
जातिभेद?
तो आ
सबको बता।
हमें छूने दे
वही घड़ा,
जिसके लिए कभी
अपना प्राण
गँवाना पड़ा।
सिर्फ समरसता की
बयार बहाते हो,
अपने घर से लाया भोजन
अपनी ही थाली में
फोटो खिंचवा
खाते हो।
मूर्ख बना सकते हो
चंद अनपढ़ों को,
मगर तोड़ोगे कैसे
ये जमे हुए
सामाजिक घड़ों को?
हमने हमेशा
अमन और शांति
का साथ दिया है,
हुई ज्यादतियाँ,
प्यार पाकर
भुला दिया है।
हमने नहीं रखा
कभी कोई गिला
पर आज भी
पूरे दम से
पूछते हैं,
यदि सच में
बराबरी का
हौसला है,
तो आओ
हाथ मिला।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554