प्रेरणा-पुंज सर गंगाराम
भारत के आधुनिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी विद्या, कर्मठता और मानवीय संवेदना से राष्ट्र के विकास की आधारशिला रखी। सर गंगाराम ऐसे ही बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे, जिन्हें एक ओर आधुनिक अभियंत्रण का अग्रदूत कहा जाता है तो दूसरी ओर कृषि नवाचारों का पथप्रदर्शक और निष्काम समाजसेवा का प्रतीक। वे केवल भवनों के निर्माता नहीं थे, अपितु जीवित मूल्यों, मानवता और लोककल्याण के शिल्पकार थे।
प्रारम्भिक जीवन
सर गंगाराम का जन्म 13 अप्रैल 1851 को मंगतांवाला तत्कालीन पंजाब प्रांत (अब पाकिस्तान के क्षेत्र) में हुआ। उनका परिवार साधन-सम्पन्न नहीं था, किंतु शिक्षा के प्रति जागरूक और संस्कारयुक्त था। बाल्यकाल से ही गंगाराम में अनुशासन, परिश्रम और जिज्ञासा के गुण स्पष्ट दिखाई देने लगे थे।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा भारत में प्राप्त की। वे बचपन से ही होनहार विद्यार्थी थे। प्रतिभा और मेधा के कारण उन्हें आगे की उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया, जहाँ उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग का विधिवत अध्ययन किया। उस समय विदेश जाकर उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त करना असाधारण बात थी। इंग्लैंड में उन्होंने आधुनिक निर्माण तकनीकों, जल प्रबंधन, नगर नियोजन और कृषि यांत्रिकी का गहन अध्ययन किया, जिसका लाभ उन्होंने आगे चलकर भारत को दिया।
आदर्श अभियंता के रूप में
शिक्षा पूर्ण कर भारत लौटने के बाद सर गंगाराम ने सरकारी सेवा में प्रवेश किया और शीघ्र ही अपनी दक्षता से उच्च पदों पर पहुँचे। वे पंजाब के सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी ) में वरिष्ठ अभियंता बने। अभियंता के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने पूर्ण निष्ठा एवं परिश्रम से शासन – प्रशासन के विषयों में दक्षता प्राप्त की। उनकी कार्यशैली में तकनीकी दक्षता के साथ-साथ सार्वजनिक हित की भावना प्रमुख थी।नगर और ग्रामीण क्षेत्र के लिए उनके द्वारा बनाई गई योजनाओं को पूरे देश में आदर्श माना जाता था।
उनका मानना था—
“अभियंत्रण केवल ईंट-पत्थर का काम नहीं, यह मानव जीवन को सुगम और सुरक्षित बनाने का साधन है।”
नगर निर्माण में योगदान
(1) आधुनिक नगर नियोजन के अग्रदूत
सर गंगाराम को लाहौर के आधुनिक निर्माता के रूप में विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। उन्होंने नगर नियोजन को केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं रखा, अपितु उसमें स्वच्छता,जल निकासी, खुली सड़कों, हवादार भवनों, हरित क्षेत्र जैसे तत्वों को अनिवार्य माना।
(2) उनके द्वारा निर्मित या योजनाबद्ध प्रमुख भवन एवं संस्थान हैं –
लाहौर म्यूजियम
जनरल पोस्ट आफिस (जीपीओ),
लाहौर नेशनल कालेज आफ आर्ट्स
मायो स्कूल आफ आर्ट्स
तथा अनेक सरकारी भवन, विद्यालय, अस्पताल एवं आवासीय कालोनियाँ
उनके द्वारा निर्मित कराए गए। इन भवनों में स्थायित्व, सौंदर्य और उपयोगिता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
ग्रामीण विकास एवं सिंचाई सुविधाएँ
मूल रूप से एक अभियंता होते हुए भी उनका सर्वाधिक योगदान कृषि क्षेत्र के लिए रहा। उनका दृष्टिकोण केवल नगरों तक सीमित नहीं था, अपितु वे ग्रामीण विकास को प्रमुखता देते थे। वे जानते थे कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और भारत मूलतः कृषि प्रधान देश है। अतः खेती की उन्नति से ही भारत की उन्नति हो सकती है। उन्होंने अपनी योजनाओं एवं प्रयोगों को अविभाजित पंजाब में लागू किया। जिस प्रयोग को करने की शासन और नौकरशाही ने उन्हें अनुमति नहीं दी, उसके लिए उन्होंने व्यक्तिगत रूप से रुचि ली और सफल करके दिखाया। इससे शासन भी उनकी बातें मानने को विवश हुआ।
ग्रामीण विकास के अंतर्गत उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में नहरें एवं जल प्रबंधन, नहरों का निर्माण, जल वितरण की वैज्ञानिक व्यवस्था, बाढ़ नियंत्रण योजनाएँ लागू कीं, जिससे कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। किसानों की जीवन-स्थिति में सुधार योजनाओं से सिंचित भूमि का विस्तार हुआ, फसल उत्पादन बढ़ा,किसानों की आय में वृद्धि हुई तथा अकाल की स्थिति में कमी आई।
महान कृषक – वैज्ञानिक
सर गंगाराम ने कृषक – वैज्ञानिक के रूप में कृषि – क्षेत्र में कई नवाचार किए। पंजाब के सूखे क्षेत्रों में उन्होंने अनेक प्रयोग किए। इसी कारण वहाँ सब ओर फसलें लहलहाने लगीं। आज देश में सर्वाधिक औसत आय पंजाब की है, इसका श्रेय बहुत मात्रा में सर गंगाराम को ही जाता है। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए अँग्रेज शासन ने उन्हें ‘सर ‘की उपाधि से सम्मानित किया।
उन्होंने अपनी निजी भूमि पर आधुनिक कृषि फार्म स्थापित किया, जहाँ उन्नत बीजों का प्रयोग, फसल चक्र प्रणाली, आधुनिक कृषि उपकरण एवं वैज्ञानिक सिंचाई पद्धति अपनाई गई। वैज्ञानिक सोच का प्रसार किया। उनका उद्देश्य केवल स्वयं लाभ कमाना नहीं था, अपितु किसानों को प्रशिक्षण देना, नए प्रयोगों के लिए प्रेरित करना तथा परंपरागत कृषि को वैज्ञानिक आधार देना था। उन्होंने पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हेतु उन्नत नस्लों के पशु, स्वच्छ दुग्ध उत्पादन, पशु स्वास्थ्य प्रबंधन पर भी विशेष कार्य किया।
सामाजिक सुधार और मानव सेवा
आर्थिक क्षेत्र में सफल होने के बाद सर गंगाराम ने सामाजिक क्षेत्रों में सुधार के प्रयास किए। उनके जीवन के निष्काम सेवा के अनेक अनुपम उदाहरण हैं ।
(1) शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के अंतर्गत उन्होंने अनेक विद्यालय, छात्रावास तथा तकनीकी संस्थान स्थापित किए। निर्धन छात्रों की शिक्षा के लिए उन्होंने छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की।
(2) स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उनकी सबसे बड़ी देन सर गंगाराम अस्पताल है, जिसकी स्थापना मानव सेवा के उद्देश्य से की गई।दिल्ली में उनकी स्मृति में गंगाराम ट्रस्ट बना है, जो गंगाराम अस्पताल का संचालन करता है। आज भी यह अस्पताल उनके सेवा-भाव की जीवंत स्मृति है।
(3)वे अपनी आय का अधिकांश भाग धर्मार्थ और सामाजिक संस्थाओं को दान कर देते थे। परोपकार एवं दान की भावना से वे शिक्षा, स्वास्थ्य, वस्त्र, भोजन हेतु निर्धनों की सहायता में व्यय करते थे। इसके लिए जनता उन्हें दयालु दानवीर कहती थी।
(4)बाल विवाह और दहेज प्रथा के विरुद्ध उन्होंने आवाज उठाई। वह विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे। कहा जाता है कि “सर गंगाराम अपने लिए कम और समाज के लिए अधिक जीते थे।”
उनका जीवन सादगी, अनुशासन और कर्मयोग से परिपूर्ण था।उनके प्रमुख जीवन सिद्धांत थे –
1.परिश्रम ही सच्ची पूजा है।
2 .विज्ञान मानवता के लिए होना चाहिए।
3.धन का सर्वोत्तम उपयोग सेवा में है।
वे कहते थे—
“समाज से लिया गया ऋण समाज को लौटाना ही सच्चा धर्म है।”
उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें ‘सर’ की उपाधि प्रदान की गई तथा
अनेक संस्थानों ने उन्हें सम्मानित किया
किन्तु वे स्वयं इन सम्मानों से अधिक लोकसेवा को महत्व देते थे।
इस महान विद्वान एवं समाजसेवी का 10 जुलाई, 1927 को निधन हो गया। उनका जीवन भौतिक रूप से समाप्त हुआ, किंतु उनके बनाए नगर, उनके स्थापित संस्थान तथा उनके सामाजिक आदर्श आज भी जीवित हैं।
सर गंगाराम का जीवन हमें यह सिखाता है कि तकनीकी ज्ञान जब मानवता से जुड़ता है, तो चमत्कार करता है। अभियंता केवल निर्माणकर्ता नहीं, समाज निर्माता भी हो सकता है। व्यक्तिगत सफलता का सर्वोच्च रूप सामाजिक कल्याण है। वे सचमुच भारत के उन महान कर्मयोगियों में से हैं, जिनका जीवन आज के अभियंताओं, प्रशासकों, किसानों और युवाओं—सभी के लिए प्रेरणा-पुंज है। राष्ट्र उन्नति के महान पथ प्रदर्शक को कोटिशः नमन।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
