कविता

गणतंत्र का स्वर्ण प्रभात

उषा के कंगन में सजी,
तिरंगे की अरुण आभा,
आज धरा ने ओढ़ी फिर
स्वतंत्रता की पावन छाया।।

संविधान के अक्षर–अक्षर में
जन-आकांक्षाओं की ज्वाला,
न्याय, समता, बंधुत्व बने
भारत की अमिट माला।।

सिंहासन नहीं, यहाँ जनता
सत्ता की सच्ची अधिकारी,
मत की शक्ति से गढ़ती है
नव-भारत की जिम्मेदारी।।

खेतों से संसद तक गूँजे
परिश्रम का पवित्र गान,
सीमा पर खड़ा जवान लिखे
मातृभूमि का अभिमान।।

भाषाएँ अनेक, स्वर अनेक,
पर स्वप्न एक, पथ एक,
गणतंत्र की इस यात्रा में
हर नागरिक है समन्वयक।।

आओ, केवल पर्व न मानेँ,
कर्तव्य को दीप बनाएँ,
संविधान की मर्यादा में
भारत का भविष्य सजाएँ।।

जय हो उस गणतंत्र की
जो मानवता का पाठ पढ़ाए,
जय हो हमारे भारत की
जो विश्व को राह दिखाए।।

— गोपाल कौशल भोजवाल

गोपाल कौशल "भोजवाल"

नागदा जिला धार मध्यप्रदेश 99814-67300