ग़ज़ल
आंखों-आंखों में रात काटी है
दम नहीं निकला, सांस बाक़ी है
एक लम्हा था, ज़िन्दगी सारी
एक ये लम्हा, कितना भारी है
कैसी ख़ामोशी, चार सू छायी
बहती आंखों से, बस सियाही है
हर क़दम मुश्किल, राह तूफ़ानी
कोई रहबर ना, कोई साथी है
उसकी मर्ज़ी क्या, कैसे बख़्शे वो
है रज़ा उसकी, जैसे राज़ी है
— डॉ. पूनम माटिया
