ग़ज़ल
महरूम हुआ खाने-पीने-सोने से
अपनी महबूबा के रूठे होने से
हुस्न समझ बैठा है इश्क़ सहमता है
उसको या उसकी हमदर्दी खोने से
किनकी-किनकी मुस्कानें चौड़ी होतीं
गहरी-गहरी इन आँखों के रोने से
आदी हो बैठा उसको भी ढोने का
उसके मेकप के बक्से को ढोने से
जीवन की पथरीली धरती क्या देगी
लेकिन बाज़ न आता सपने बोने से
बनवाना चाहा तो था इक भव्य महल
जो बन पाया वो भी ढहता लोने से
गंदा होने से दामन बच पाया क्या
धब्बा ही हल्का हो जाता धोने से
— केशव शरण
