दोहे
छोड़े जब ईमान तो होते गये अमीर।
चिंता उनको क्या भला,खोते हुए ज़मीर।।
पढ़ – लिख कर आगे बढ़े पाया जब अधिकार।
जनता का शोषण किया,लूटा बस संसार।।
वर्ण व्यवस्था आज भी बनी हुई चहुंओर।
ऊंच नीच की अर्गला मचा रही है शोर।।
सागर को मथता रहा,ले सीपी की आस।
स्वाति की इक बूंद से नहीं बुझेगी प्यास।।
सांसें तो ठहरी हुई तकती अगली भोर।
बहरी सत्ता क्या सुने सन्नाटे का शोर।।
बनने को वे बन गये सबके मनसबदार।
डाल रहे जनतंत्र पर डाके बारम्बार।।
नज़रों और नजारों में छिपा हुआ शैतान।
राजनीति में आ घुसे गुण्डे व हैवान।।
थोड़ा सा जीवन रहा व नश्वर संसार।
न जाने कैसे मगर फैला भ्रष्टाचार।।
— वाई. वेद प्रकाश
