भारत के संसदीय तंत्र के खिलाफ षड्यंत्र
4 फरवरी 2026—इस तारीख को याद रखिए, और केवल आज के लिए नहीं, आने वाले वर्षों के लिए याद रखिए। इस दिन जो कुछ भारत की संसद में हुआ, वह न तो सामान्य संसदीय हंगामा था, न विपक्ष की आक्रामक राजनीति, और न ही कोई क्षणिक अव्यवस्था। यह एक सुनियोजित और सोचा-समझा षड्यंत्र था—भारत के संसदीय तंत्र के खिलाफ, भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ, और सीधे-सीधे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ।
यह घटना जितनी गंभीरता से ली जानी चाहिए थी, उतनी न तो सत्तारूढ़ पक्ष ने ली, न लोकसभा अध्यक्ष ने, और न ही अधिकांश राजनीतिक दलों ने। जबकि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं—वैचारिक असहमति, नीतिगत विरोध, सत्ता और विपक्ष के बीच खींचतान—यह सब लोकतांत्रिक संतुलन को जीवित रखते हैं। लेकिन जब पूरी संसदीय व्यवस्था को कलंकित करने और पंगु बनाने का प्रयास किया जाए, तब वह सामान्य राजनीतिक घटना नहीं रह जाती; वह लोकतंत्र पर सीधा हमला बन जाती है।
लोकसभा में वह अभूतपूर्व क्षण
4 फरवरी को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी। यह संसदीय परंपरा है, नियम है, और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता भी कि इस चर्चा का उत्तर प्रधानमंत्री दें। उस दिन शाम 5 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सदन में आकर जवाब देना था।
लेकिन प्रधानमंत्री सदन में नहीं आए।
यह बात इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि भारत के संसदीय इतिहास में—चाहे आप 1947 से देखें या 1950 में गणतंत्र बनने के बाद से—ऐसा कभी नहीं हुआ कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का उत्तर प्रधानमंत्री न दें, या उन्हें उत्तर देने से रोका जाए। यह घटना अपने-आप में संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी थी।
प्रधानमंत्री के सदन में न आने का कारण और भी चौंकाने वाला था। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्वयं प्रधानमंत्री को यह सूचना दी कि वे सदन में न आएं। यह भी पहली बार हुआ कि लोकसभा अध्यक्ष ने सदन के नेता से कहा कि आपकी उपस्थिति से स्थिति बिगड़ सकती है।
षड्यंत्र का स्वरूप
कारण स्पष्ट था। एक सुनियोजित योजना के तहत कांग्रेस और उसके कुछ सहयोगी दलों की महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री के आसन को आगे और पीछे से घेर लिया था। संसद में बैठने की व्यवस्था स्पष्ट और सख्त होती है—स्पीकर के बाईं ओर विपक्ष, दाईं ओर सत्ता पक्ष। सामान्य परिस्थितियों में कोई सदस्य दूसरे पक्ष की ओर जाकर इस तरह घेरा नहीं बनाता।
यह कोई आकस्मिक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी। यह एक पूर्वनियोजित कार्रवाई थी।
अब एक पल के लिए कल्पना कीजिए—यदि प्रधानमंत्री स्पीकर की सलाह न मानते और सदन में आ जाते। चाहे कोई यह मान भी ले कि उन महिला सांसदों का शारीरिक हमला करने का इरादा नहीं था, फिर भी स्थिति विस्फोटक होना तय थी। सत्तारूढ़ दल के सांसद चुपचाप तमाशा नहीं देखते। वे वेल में आते। मार्शल्स हस्तक्षेप करते। धक्का-मुक्की होती। और यह सब लाइव टेलीकास्ट पर देश-दुनिया देखती।
यही वह दृश्य था, जिसे रचने की कोशिश की गई।
बाद के बयान और षड्यंत्र की पुष्टि
यह बात केवल अंदाजे पर आधारित नहीं है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से कहा कि अगर विपक्ष की महिला सांसद प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गईं, तो इसमें क्या गलत है। इस बयान से यह स्पष्ट हो गया कि इस पूरी घटना की जानकारी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को थी।
जब यह योजना सफल नहीं हुई, तो नैरेटिव बदल दिया गया। राहुल गांधी ने कहना शुरू किया कि प्रधानमंत्री डरकर भाग गए। यानी संसदीय गरिमा की रक्षा को कमजोरी के रूप में पेश करने की कोशिश की गई।
वास्तविकता यह है कि प्रधानमंत्री ने सदन में न जाकर एक बड़े टकराव और संभावित हादसे को टाल दिया। यह व्यक्तिगत सुरक्षा का नहीं, संसद की मर्यादा का फैसला था।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
यह प्रश्न केवल नरेंद्र मोदी का नहीं है। यह प्रश्न देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री की सुरक्षा का है—वह भी संसद के भीतर। यदि संसद के अंदर प्रधानमंत्री की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, तो इससे बड़ा संकट संसदीय लोकतंत्र के लिए क्या हो सकता है?
क्या भविष्य में प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए संसद के भीतर एसपीजी तैनात करनी पड़ेगी? यह विचार ही इस बात का प्रमाण है कि स्थिति कितनी गंभीर दिशा में जा चुकी है।
अध्यक्ष की जवाबदेही और कठोर निर्णय की आवश्यकता
इस पूरे घटनाक्रम में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। बार-बार कार्यवाही बाधित होना, वेल में नारेबाजी, प्लेकार्ड दिखाना, कागज फाड़कर पीठासीन अधिकारी की ओर फेंकना—यह सब अब सामान्य होता जा रहा है। निलंबन जैसी कार्रवाइयों से कोई सुधार नहीं हो रहा।
जब दवा काम न करे, तो खुराक बढ़ानी पड़ती है या इलाज बदलना पड़ता है।
जो सदस्य इस तरह से सदन की गरिमा को चुनौती देते हैं, उनकी सदस्यता समाप्त क्यों नहीं होनी चाहिए? ऐसे लोग संसद का हिस्सा बने रहने के अधिकारी क्यों माने जाएं?
इतिहास गवाह है कि अनुशासन क्या होता है। डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे बड़े नेता को भी जवाहरलाल नेहरू के दौर में कई बार मार्शल्स द्वारा सदन से बाहर ले जाया गया—क्योंकि नियम सर्वोपरि थे। आज नियमों को मजाक बना दिया गया है।
अब धैर्य नहीं, निर्णायक कार्रवाई का समय
प्रधानमंत्री की आलोचना कीजिए। सरकार को कठघरे में खड़ा कीजिए। नीतियों पर हमला कीजिए। यह लोकतंत्र है।
लेकिन प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरे में डालना, सदन को अराजकता का मंच बनाना और संवैधानिक पदों की गरिमा को कुचलना—यह लोकतंत्र नहीं, जनतंत्र-विरोध है।
4 फरवरी 2026 कोई साधारण दिन नहीं था। यह उस दिशा का संकेत था, जिस ओर राजनीति को धकेलने की कोशिश की जा रही है। अगर आज इस पर कठोर और निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो कल संसद और लोकतंत्र दोनों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
अब सवाल सीधा और स्पष्ट है: क्या संसद अपनी मर्यादा की रक्षा करेगी, या अराजकता के सामने झुकने को ही नया सामान्य मान लेगी?
— रोहताश कुमार बंसल
