सहज भी लुभाता है!
आजकल हर ओर एक अजीब-सी होड़ दिखाई देती है—रील बनाने की, वायरल होने की और किसी भी तरह से प्रसिद्धि तथा पैसा कमाने की। इस दौड़ में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल किए जा रहे हैं, युवा लड़के-लड़कियां स्वयं आगे बढ़ रहे हैं और बड़ी उम्र की महिलाएं भी बड़ी संख्या में इसमें सक्रिय हैं। पुरुष भी हैं, किंतु अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं। शायद इसका एक कारण यह भी है कि कई बार रील का कंटेंट खतरनाक स्टंट या शारीरिक प्रदर्शन पर आधारित होता है, जो हर किसी के लिए संभव नहीं होता।
वायरल होने की इस अंधी दौड़ में एक चिंताजनक प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है—नग्नता, फूहड़पन और सनसनीखेज हरकतों का सहारा लेना। कोई अपनी देह का प्रदर्शन कर रहा है, कोई जान जोखिम में डालकर रेल की पटरी या ऊंची इमारतों पर स्टंट कर रहा है, तो कहीं अजीब-ओ-गरीब और भड़काऊ नृत्य को मनोरंजन का नाम दिया जा रहा है। जब इस पर सवाल किया जाता है तो अक्सर एक ही जवाब मिलता है—“लोगों को यही पसंद है।” “लोग यही देखना पसंद करते हैं” या “अब ज्ञान और गंभीर बातें कौन सुनता है।” परंतु यह आधा सत्य है।
समाज केवल उत्तेजना से नहीं चलता, वह संवेदनाओं और स्मृतियों से भी संचालित होता है। इसका प्रमाण हमें तब मिलता है, जब एक सौ तीन वर्ष की वृद्ध दादी अपने पोते के साथ सहज बातचीत करती हुई दिखाई देती हैं और उनकी साधारण-सी रील लाखों लोगों के दिल को छू लेती है। उसमें न कोई अभिनय था, न प्रदर्शन, न चकाचौंध—केवल जीवन की सादगी और रिश्तों की गर्माहट थी। वायरल दादी अपने पोते के साथ सहज और स्वाभाविक बातचीत करती दिखाई देती हैं। उन रीलों को देखकर अनगिनत लोगों को अपने बचपन और अपनी दादी-नानी की याद आ जाती है। मैं स्वयं भी उन्हें देखते-देखते आगे स्क्रॉल नहीं कर सकी।
ऐसी रीलें यह सिद्ध करती हैं कि लोगों के भीतर आज भी मासूमियत, अपनापन और सादगी के लिए स्थान बाकी है। आकर्षण केवल चकाचौंध में ही नहीं होता; कई बार सादगी ही सबसे अधिक आकर्षित करती है।
मुझे ऐसा ही लगता। लोगों के भीतर आज भी संवेदनाएं, सादगी और मासूमियत के लिए जगह बाकी है। दादी का वायरल होना यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे भीतर आज भी “देसीपन”, अपनापन और सरलता जीवित है। आकर्षण केवल चकाचौंध या उत्तेजना में ही नहीं होता; सहजता में भी एक अद्भुत खिंचाव होता है—और कई बार वही सबसे अधिक लुभाता है।
एक और चिंताजनक प्रवृत्ति है—छोटे बच्चों से बड़ों जैसी बातें और अभिनय करवाना। तीन-चार साल के बच्चों को “बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड” जैसी भूमिकाएं निभाते देखना मनोरंजन कम और मानसिक दिवालियापन अधिक प्रतीत होता है। बच्चों का बचपन उनसे छीनकर उन्हें दर्शकों की तालियों का साधन बना देना समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
वास्तव में जरूरत इस बात की है कि हम भेड़-चाल से बचें। यह सोचकर कि “सब कर रहे हैं, तो हम क्यों न करें”, हम अनजाने में गलत प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं। सम्मानजनक और सार्थक तरीके से भी लोकप्रिय हुआ जा सकता है—और दादी की सरल रीलें इसका जीवंत उदाहरण हैं।
हमें यह याद रखना होगा कि प्रसिद्धि क्षणिक हो सकती है, लेकिन संस्कार और संवेदनाएं पीढ़ियों तक चलती हैं। इसलिए बच्चों का बचपन बचाए रखना, सादगी को सम्मान देना और सहजता को अपनाना ही सच्ची समझदारी है।
— प्रज्ञा पाण्डे मनु
