एक हाथ से ताली
एक हाथ से ताली बजाने वालों,
ध्यान से मेरी बात सुनो—
तुम्हें कभी न कभी
ज़रूरत पड़ेगी
दूसरे हाथ की…
साथियों के साथ की…
जब खुद पर बीतेगी,
तब खोजोगे दूसरा हाथ,
और अपनी ही ताली पर
दोगे सफ़ाई की सौ–सौ बातें,
पर याद रखना—
जिस दिन अति आवश्यकता होगी,
उस दिन
पीछे कोई खड़ा नहीं होगा।
कुछ चुनिंदा सरपरस्त
जब खुद फँसने लगेंगे,
तो सबसे पहले
तुम्हीं पर उँगली उठाएँगे,
अपना दामन पाक-साफ,
और तुम्हें दाग़दार बताएँगे।
औरों का नुकसान करने की हनक में
तुम अपना ही पैर तुड़वाओगे,
रह-रह कर छटपटाओगे—
कि जो साथ खड़े थे
वे कहाँ गए?
कीमती हीरे-मोती
कैसे गंवा गए?
नहीं है तुम्हारे भीतर कोई कस्तूरी
जिसे तुम बाहर खोजोगे,
अपने ही किरदार की सुगंध
तुम सदा के लिए खो दोगे।
एक हाथ से ताली बजाना
तुम्हें मुबारक़ हो,
पर साफ़-साफ़ दिख रहा है—
यह ताली नहीं,
तुम्हारा लोभ है,
तुम्हारी हवस है,
तुम्हारी तिजारत है!
— राजेन्द्र लाहिरी
