कविता

कछुआ और खरगोश

कछुआ और खरगोश
एक मंद, एक तेज
प्रतियोगिता में स्वयं ही नहीं उतरे थे
इन्हें उतारा गया था
कतिपय तत्कालीन छलियों द्वारा।

खरगोश यूं ही नहीं सोया था
उसे सुलाया गया था
उसकी तेज धावकी को बढ़ा-चढ़ाकर
पक्की जीत का आश्वासन देकर
प्रतिस्पर्धी को अक्षम बताकर
और
प्रेरित किया गया था कछुए को
लगातार, बिन थके, बिन रुके
चलने के लिए
अनवरत आगे बढ़ने के लिए।

दोनों प्रतिभागी
किन्हीं दूसरों द्वारा संचालित थे
कछुआ को योजना समझा दी गई थी
रटा दी गई थी
किंतु खरगोश
अप्रत्यक्ष किया गया था मदहोश
शल्य को रिझाने के लिए
दुर्योधन का जाल बिछा था
सोया नहीं बल्कि सोना ही था
लक्ष्य एवं उद्देश्य को खोना ही था।

फलतः अपराजेय हुआ पराजित
कछुआ विजयी
छलियों का छल जीत गया था
जीत रहा है, जीतता रहेगा….
जब तक खरगोश
एक साथ मिलकर छल- जाल न काटेंगे
छलियों का मायाजाल न काटेंगे
जीत का एकाधिकार न तोड़ेंगे
बहकावे में आना न छोड़ेंगे।

हमारे देश का तथाकथित लोकतंत्र
इस लोकतंत्र के तथाकथित नेतागण
कुर्सी से जोंक की तरह चिपककर
हर नई सरकार में
पहले से ज्यादा छल कर रहे हैं
पक्ष और प्रतिपक्ष एक होकर
मेधा को निष्फल कर रहे हैं
मंद को सफल कर रहे हैं।
कछुओं को जिताने के लिए
खरगोशों को विफल कर रहे हैं।

— डॉ. अवधेश कुमार अवध

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन