कछुआ और खरगोश
कछुआ और खरगोश
एक मंद, एक तेज
प्रतियोगिता में स्वयं ही नहीं उतरे थे
इन्हें उतारा गया था
कतिपय तत्कालीन छलियों द्वारा।
खरगोश यूं ही नहीं सोया था
उसे सुलाया गया था
उसकी तेज धावकी को बढ़ा-चढ़ाकर
पक्की जीत का आश्वासन देकर
प्रतिस्पर्धी को अक्षम बताकर
और
प्रेरित किया गया था कछुए को
लगातार, बिन थके, बिन रुके
चलने के लिए
अनवरत आगे बढ़ने के लिए।
दोनों प्रतिभागी
किन्हीं दूसरों द्वारा संचालित थे
कछुआ को योजना समझा दी गई थी
रटा दी गई थी
किंतु खरगोश
अप्रत्यक्ष किया गया था मदहोश
शल्य को रिझाने के लिए
दुर्योधन का जाल बिछा था
सोया नहीं बल्कि सोना ही था
लक्ष्य एवं उद्देश्य को खोना ही था।
फलतः अपराजेय हुआ पराजित
कछुआ विजयी
छलियों का छल जीत गया था
जीत रहा है, जीतता रहेगा….
जब तक खरगोश
एक साथ मिलकर छल- जाल न काटेंगे
छलियों का मायाजाल न काटेंगे
जीत का एकाधिकार न तोड़ेंगे
बहकावे में आना न छोड़ेंगे।
हमारे देश का तथाकथित लोकतंत्र
इस लोकतंत्र के तथाकथित नेतागण
कुर्सी से जोंक की तरह चिपककर
हर नई सरकार में
पहले से ज्यादा छल कर रहे हैं
पक्ष और प्रतिपक्ष एक होकर
मेधा को निष्फल कर रहे हैं
मंद को सफल कर रहे हैं।
कछुओं को जिताने के लिए
खरगोशों को विफल कर रहे हैं।
— डॉ. अवधेश कुमार अवध
