दोहा
मुझे पढ़ो जब भी कभी,करना सोच विचार |
जीवन का सच लिख दिया,मैने बारम्बार ||
मरना लगता है सरल,है जीना दुश्वार |
बेबस को लाचारियां,कैसे देती मार ||
रोजगार के बिन यहाँ,जीवन है अभिशाप |
जहर जिन्दगी का पियो,हरदिन बस चुपचाप ||
निर्धनता को कोस कर,हो जाते निफ्राम |
पर उन्मूलन के लिए,करें न नेता काम ||
पद पाते ही वो हुए,हमसे कितने दूर |
अहंकार इतना हुआ,दिखने लगा गुरूर ||
— शालिनी शर्मा
