बर्फ के पहाड़
गिरती है जब बर्फ
चमक उठते है पहाड़
सफेद चादर से ढके
आंखे चुंधिया जाती है देख कर
पहाड़ी के लिए आम है बर्फ का गिरना
कठिनाईयों से जूझती जिंदगी
मुश्किल होता है रास्ता ढूंढना
पशुओं के लिए चारा
रोटी बनाने के लिए लकड़ी
कैसे आएगी उस गिरी बर्फ में
बीमार कोई हो जाये
कैसे पहुंचेगा हॉस्पिटल
सड़कें बन्द बिजली नहीं
पानी के नल जमे हुए
हड्डियां तक जमा देने वाली ठंड
हाथ को हाथ का पता नहीं
कैसे स्कूल भेजें बच्चों को
दूरसंचार ठप्प दुनियां से बेखबर
कहीं बर्फीला तूफान
कहीं चट्टानें खिसक रही
पहाड़ का आदमी बहुत परेशान
लेकिन हिम्मत नहीं हारता
डट कर करता है मुकाबला
सभी कठिनाईयों का
लगता है जैसे किसी हाड मांस का नहीं
बना है किसी कठोर धातु का
पहाड़ चढ़ना उतना नहीं अखरता उसको
बचपन से पला बढ़ा है पहाड़ पर
यहां रहने वाले जुड़े है अपनी संस्कृत से
कूट कूट कर भरे हैं उनमें संस्कार
फिर एक दिन आते है कुछ सैलानी
घूमने पहाड़ पर
खुश होते हैं देख कर
पहाड़ पर पड़ी बर्फ
उनके लिए खुशी है बर्फ देखना
उसमें अठखेलियाँ करना
कूड़ा कचरा फैलाना
तहस नहस करना हमारी संस्कृति को
और वापिस चले जाना
नाचते गाते है बर्फ में
रीलें बनती हैं बेशर्मी से
कपड़े उतारते हैं निर्लज्ज
शराब की बोतलों को लहराते है हवा में
हो हल्ला करते हैं हुड़दंग मचाते है
कहें कुछ पहाड़ के लोग तो
लड़ते हैं आंख दिखाते हैं
तार तार कर रहे पहाड़ की संस्कृति को
डर नहीं उनको न देवी देवताओं का
न समाज में प्रचलित मान्यताओं का
रह गया पहाड़ का आदमी
उस कचरे को साफ करता
अपने घर पहाड़ की सफाई करता
क्योंकि पहाड़ उसका अपना है
कोई घूमने की जगह नहीं
यहीं पैदा हुआ यहीं जियेगा
और एक दिन इसी पहाड़ पर
चला जायेगा दुनियां छोड़ कर
अपनों की दुनियां से मुंह मोड़ कर
— रवींद्र कुमार शर्मा
