मां तुम कहां हो!
ढूंढ़ता हूं मां को
तिरती हवाओं में
बादलों में
काली घटाओं में
बस ढूंढ़ता हूं मां को।
हर सुबह उठकर
घड़ी पर टिकी निगाहों के बीच
जाते हुए काम पर
ढूंढ़ता हूं मां को।
सांसों की सरगम में
एहसासों की पूरी कायनात में
इस सजीले चांद में
ढूंढते हुए तुम्हारा चेहरा
यादों में आता बार – बार
थका – हारा लौटता हूं
शाम को घर तो
तुम्हारी शीतल मुस्कान
कर देती है आत्मा को ठण्डा
रात की नींद को आसान।
एक सपने की याद की तरह
ढूंढ़ता हूं मां तुमको बार – बार।
तुम्हारा गुस्सा होना
दिखा देना उस गुस्से को
जता देना एक एहसास
अपनी अहमियत का।
तुम्हें क्या पता
ढूंढ़ता हूं तुम्हें मैं
यादों में पकड़कर तुम्हारा आंचल
रोना चिल्लाना
मचल – मचल जाना
मार खा कर चुप हो जाना।
ढूंढ़ता हूं मां को आज
जब नहीं हैं वह इस धरा- धाम पर
पसरे सन्नाटे के बीच
सिहर उठती हैं यादें
ढूंढ़ता हूं मां को
मां तुम कहां हो।
— वाई. वेद प्रकाश
