असन्तोष की आवाज
पत्ते झरते हैं
वायु में फुसफुसाहट
मन खामोश है
सागर की लहरें
चट्टानों से टकरातीं
गूंज उठती हैं
अँधेरी रात में
सुरज की लाल किरण
रोशनी खोजती
हवा का झोंका
सिहरन में बदल जाता
दिल काँप उठता
पत्थर की गूंज
अनसुनी बातें कहती
ध्वनि फैलती
नदी की बहती धारा
काँपती हुई राह पर
सपने ले जाती
सन्नाटा गहरा
भीतर उठती हलचल
आसमान देखे
चाँदनी रात में
छुपी यादें जगतीं
आँखें नम होती
अजनबी शहर में
परछाईयाँ खेलतीं
असन्तोष बढ़ता
सन्नाटे की आवाज
कदमों से टकराती
मन बहकता
अधूरी बातें
कागज पर लिखी जातीं
हृदय रोता
अन्तहीन सोच
सन्नाटे में गूँजती
आवाज़ बुलाती
अविरल बारिश
सपनों को धो डालती
मन तरसता
धूप की किरण
छिपा दर्द उजागर करे
मन हल्का हो
सागर किनारे
हृदय की लहरें उठें
शोर बन जाए
हवा में बिखरे
अवाजें चुप रहना चाहें
सन्नाटा बोले
सन्नाटे में भी
असन्तोष की गूँज
जीवन सीखाए
— डॉ. अशोक
