कविता

आज है होली

जंगल में होली आई रे,
रंग उड़े चौतरफ़ा भाई रे।
मोर नाचा, तितली डोली,
तोता बोला“आज है होली!”

शेर दहाड़ा “मैं हूँ राजा!”
भालू बोला“पहले नाश्ता!”
हाथी पी भंग, कोयल बोली
दहाड़ नहीं, आज है होली!

हिरण हँसा, व्यंग्य उछाला
राजा! तेरा न्याय निराला,
सिंहासन सोने से चमके खूब,
पर सोच गई है जंगल से रूठ!

शेर ने समझी बात वही,
अकड़ उतारी, दहाड़ गई।
रंग में घुल गया राजा-भेद,
होली ने तोड़ दिए सारे खेद।

— सोमेश देवांगन

सोमेश देवांगन

गोपीबन्द पारा पंडरिया जिला-कबीरधाम (छ.ग.) मो.न.-8962593570