तर्कों की जगह ‘शोर’
एक बार फिर कठघरे में ‘संसद की गरिमा’ खड़ी,
अप्रकाशित किताब, बड़े दावे और कहानी बड़ी।
एक और तीखे दुर्भाग्यपूर्ण ‘टकराव’ रूप में दर्ज,
हमारे नेता प्रतिपक्ष ने निभाया हैं यह कैसा फर्ज़।
सरकार की नीतियों पर गंभीर व मर्यादित विमर्श,
आक्रामक राजनीति और तथ्यों से कर रहें संघर्ष।
तर्कों की जगह ‘शोर’ ने फिर छिन लिया वो स्थान,
सामंती प्रवृत्ति फिर खाली हाथ देखते रहें नादान।
राजनीतिक रणनीति पे ‘गंभीर’ प्रश्न खड़े होने लगे,
अप्रमाणिक स्रोत से उद्धरण देकर स्वयं बोने लगे।
विपक्ष के अटल और आडवानी होना आसान नहीं,
संसद के नियम-कायदों का पालन लघु काम नहीं।
— संजय एम तराणेकर
