कविता

दृष्टिकोण

सफ़र यूं ही जिन्दगी का कटता रहा,
आलोचनाओं से हर पल धिरता रहा।
महज़ एक दृष्टिकोण सकारात्मक था
दृश्यों का अनुभव कुछ अनोखा रहा।।

नज़रिया बदल जाए तो एक युग बनेगा,
भाषा मार्ग दर्शक रही तो प्रर्वतक मिलेगा।
ऐसा ही एकमात्र सुदृढ़ संकल्प लिया था,
कल्पनाओं के भंवर में कहीं तो गुल खिलेगा।।

किरदार बहुत देखे होंगे तुमने इस सफ़र में,
मगर सुलझे हुए तार बहुत कम होंगे ज़हन में
भावों का चक्रव्यूह चहुं ओर छाया हुआ था,
परिप्रेक्ष्य की भूमिका थी मेरे हर अध्ययन में।।

शाखाओं का निर्माण चेतनाओं की भूमिका
शब्दों की दृढ़ पट्टिका व्याकरण की तालिका
ऐसा ही कुछ निर्णय आत्म चेतना चयन था
भरी तपस्थली में युग जैसी चल रही नाविका।।

— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)