मूक पखेरुओं की पुकार
तोता रो-रोकर सुनाए, मूक पखेरू की कहानी,
आँखों से आँसू बहते, कहता दुख की जुबानी।
मेरी गौरैया अब देखो, कहीं नहीं फुदक पाती,
दिख जाए जो किसी कोने, तो वह मारी जाती।
कालू कौआ अब न बोले, कहीं नहीं काँव-काँव,
पेड़ सभी कटते गए, मिलती नहीं कहीं छाँव।
कमली कबूतर की गुटर-गूँ, न दाना न ही पानी,
स्वार्थवश मार-मार खाया, सुना रही यही कहानी।
कोयल कू-कू कहाँ करे, आम न आए बसंत में,
पकड़-पकड़ कर मार रहे, अंत लगे बसंत में।
रंग-बिरंगी चिड़ियों की, टोली कहीं न उड़ पाती,
इस डाल से उस डाल कहीं, अब बैठ न पाती।
उल्लू भाई को “उल्लू” कह, करते उसका शिकार,
तांत्रिक पूजा-पाठ रचाकर, चलता काला व्यापार।
गिद्ध तो अब मानव बनकर, एक-दूजे को नोचे,
अपना लाभ हो कब कितना, बस यही हरदम सोचे।
सबके लिए इंसानों ने, अदृश्य कैसा जाल बिछाया,
जो पंछी उड़ भी निकले, नीचे फिर कभी न आया।
अपनी दुख-पीड़ा किससे, हम जाकर कह पाएँ?
हे प्रभु! रक्षा कीजिए, हम आपकी शरण आएँ।
— सोमेश देवांगन
