लघुकथा – संस्कार
“माँ हमने जमीन लेनी की सोची है।चलिए हमारे साथ ,आप भी एक बार जमीन देख लीजिए।”
छोटे बेटे ने कहा।
“अरे भई, मुझे कितने दिन इस दुनिया में रहना है। तुम बहू के साथ जाओ देख आओ।”
“अरे नहीं मांजी आप चलिए न हम लोगों के साथ।आपकी राय हमारे लिए जरूरी है।”
बहू ने बड़े आग्रहपूर्वक कहा।
“माँ ,ये नक्शा कैसा है?आप भी देख लीजिए ।”बेटे ने कहा।
अरे,बेटे तुम लोग सब मेरी मर्जी से करना चाहते हो।बहू से भी सलाह मशविरा कर लिया करो।रहना उसे ही है।”माँ ने मुस्कुराते हुए कहा।
“नहीं मांजी, आप हमारे घर की बड़ी -बजुर्ग हैं।आपसे नहीं पूछेंगे तो किससे पूछेंगे?” बहू ने बड़े आदरपूर्वक कहा।
तभी उनकी आया पार्वती आई और कहा-“भाभी जी,मुन्ना बहुत रो रहा है।लीजिए इसे।”
माँ ने कहा-“हां बहू देखो इसे भूख लगी होगी।जाओ इसे दूध पिलाओ।”
पार्वती ने मुस्कुराते हुए कहा-“मांजी ,आपके दोनों बेटे कितने संस्कारी और शालीन है।आपकी हर बात मानते हैं। देखिए न जमीन खरीदने से लेकर मकान बनवाने तक आपका मार्गदर्शन लेते हैं।आजकल तो शादीशुदा बेटे अपने माता-पिता को पानी तक नहीं पूछते हैं।ऐसे में आपके बेटे एक मिसाल हैं।आप तो बड़ी भाग्यवान हैं जो ऐसे आज्ञाकारी बेटे मिले।ये आपके अच्छे संस्कारों का प्रतिफल है ।”
माँ ने कहा”-हां रे परबतिया ,ये सब ऊपर वाले कि कृपा है । ये सब मेरे पतिदेव के अच्छे संस्कारों का फल है ।जिस तरह हम लड़कियों को कड़े अनुशासन में रखते हैं।उन्हें अच्छे संस्कार देते हैं।वैसे ही हमें लड़कों को भी सेवा कर्तव्यों का पाठ पढ़ाएं,तभी बच्चे संस्कारी बनेंगे। हम लोगों को यही संस्कार मिला था।मेरे बच्चों ने देखा है कि हम लोग उनके दादा -दादी और नाना -नानी की हर बात मानते थे। बच्चे जो देखते हैं वही सीखते हैं।”
पार्वती ने हामी भरते हुए कहा-“ठीक है माँ कोशिश करूंगी कि यही सब शिक्षा मैं अपने बच्चों को दे सकूँ।”
— डॉ. शैल चन्द्रा
