कविता

इंसाफ का तराजू

न्यायालय के कटघरों में
खड़े होकर
शपथ लेते हैं हम,
गीता और कुरान की l
कुछ की नजरों में ,
ये हैं ईश्वरीय रचनाएँ l
महज पुस्तकें हैं ये,
कहती हैं कुछ
अपराधियों की निगाहें ll
ऐसी निगाह रखने वालों को,
क्या फर्क पड़ता है ?
अन्यायी गर राज करें
और न्यायप्रिय जेल में जाएँ ।
तभी तो,
न्याय की देवी ने
बाँध रखी है
आँखों पर काली पट्टी,
नहीं देखना चाहती हैं
वो उन अधर्मी,
विगलित मानसिकता युक्त
अपराधियों को ।
ध्यान से देखना,
उनकी तराजू को,
पलड़े स्वतः ही
ऊपर नीचे हो गए हैं ।
सत्य का पल्लू
पकड़े हुए वादी ,
जब नहीं जीत पाता
मुकदमा अपना
रो कर पूछता है
न्याय की इस देवी से
क्या हम तुम्हारे ही
मंदिर में खड़े हैं ?

— बृज बाला दौलतानी