कविता

कविता

आओ बैठो पास ज़रा, कुछ बातें कर लें बीते कल की,
माना कुछ मुश्किल भी थी, बातें ख़ुशियों के हर पल की।
नहीं बहुत उपलब्धि अपनी, पर हमने कुछ खोया न था,
बातें सागर के जल की, कुछ नदियों के शीतल जल की।

विगत की चर्चा बहुत हुई, अब कुछ कर लें आगत की,
महँगाई का दौर चल रहा, बातें शिक्षा पर लागत की।
बीत गया अपना तो जीवन, सन्तुष्टि की राह पर चल,
नये दौर में सुविधाओं की, कुछ बच्चों की आदत की।

आमदनी कम खर्च अधिक, मिल जुल कर सह लेंगे,
अपने कपड़े फटे हुये हैं, सील सील कर रह लेंगे।
पर अम्मा की धोती लानी, बाबा का चश्मा बनवाना,
बच्चे भी पुराने कपड़ों को, होली तक तो सह लेंगे।

अबकी होली बहन के घर, सिंधारा भी भिजवाना है,
सास ससुर दामाद की खातिर, जोड़ा भी सिलवाना है।
कुछ पैसे जमा किए हैं मैंने, थोड़े तुम इन्तज़ाम करो,
पहली बार बहन के घर, बच्चों को भी लेकर जाना है।

बात रह गयी खास, जो तुमको बतलानी थी,
पहली बार मिले थे हम, बात याद दिलानी थी।
लाये थे जो फूल, अभी तक मैनें संजो कर रखा,
ख्याल सदा यूँ ही रखना, यह तुमको समझानी है।

— डॉ अ. कीर्तिवर्द्धन