युद्ध-मुक्त विश्व है मानव जाति के कल्याण की पहली शर्त
मानव सभ्यता का इतिहास युद्धों का इतिहास है — यह कथन जितना कटु है, उतना ही सत्य भी। जब से मनुष्य ने संगठित समाज बनाया, तब से उसने संगठित हिंसा भी रची। बाबुल की दीवारों से लेकर हिरोशिमा की राख तक, रोम के कोलोसियम से लेकर यूक्रेन के मलबे तक — युद्ध की छाया मानवीय प्रगति के हर पन्ने पर किसी न किसी रूप में अंकित है। Our World in Data के शोधकर्ता एंड्रियास विमर सहित इतिहासकारों के अनुमान के अनुसार बीसवीं शताब्दी में लड़े गए युद्धों में लगभग ग्यारह करोड़ से अधिक लोग काल के गाल में समा गए — यह संख्या किसी एक महामारी, किसी एक प्राकृतिक आपदा, या किसी एक अकाल से होने वाली मृत्यु से कहीं अधिक है। इक्कीसवीं शताब्दी में भी यह सिलसिला नहीं थमा। सीरिया, अफगानिस्तान, इथियोपिया, म्यांमार, यमन और यूक्रेन जैसे देशों में चल रहे सशस्त्र संघर्षों ने करोड़ों मनुष्यों को विस्थापित किया, लाखों को काल के गाल में धकेला और अनगिनत पीढ़ियों के भविष्य को अंधकार में ढकेल दिया। ऐसे में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या युद्ध-मुक्त विश्व की स्थापना वास्तव में मानव जाति के कल्याण की सबसे पहली और सबसे आवश्यक शर्त है? इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए न तो किसी जटिल दर्शन की आवश्यकता है, न ही किसी अमूर्त सिद्धांत की — केवल उन तथ्यों की ओर देखना पर्याप्त है जो इतिहास की पाठशाला ने रक्त से लिखे हैं।
युद्ध केवल लाशों का ढेर नहीं बनाता, वह सभ्यता की नींव को भी खोखला करता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक स्थिरता — ये चारों स्तंभ जिन पर मानव कल्याण की इमारत खड़ी होती है, युद्ध की आँधी में क्षण भर में धूल में मिल जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययनों के अनुसार संघर्षग्रस्त देशों में मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर शांतिपूर्ण देशों की तुलना में तीन से पाँच गुना अधिक होती है। यमन जैसे देश में — जहाँ 2015 से गृहयुद्ध चल रहा है — बीस लाख से अधिक बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं और स्वास्थ्य सेवाओं का लगभग आधा ढाँचा ध्वस्त हो चुका है। अफगानिस्तान में दो दशकों से अधिक चले संघर्ष के बाद भी वहाँ की सामाजिक-स्वास्थ्य परिस्थिति दक्षिण एशिया के शांतिपूर्ण देशों की तुलना में बहुत पीछे है। यह केवल संख्या नहीं है, यह उन लाखों जिंदगियों की कहानी है जो समय से पहले बुझ गईं क्योंकि किसी के राजनीतिक अहंकार या सत्ता की लालसा ने एक पूरी पीढ़ी की नियति तय कर दी।
शिक्षा पर युद्ध का प्रभाव भी उतना ही विनाशकारी है जितना स्वास्थ्य पर। यूनेस्को के आँकड़े बताते हैं कि विश्व के करोड़ों बच्चे जो स्कूल से बाहर हैं उनमें से बहुसंख्यक उन्हीं देशों में हैं जहाँ युद्ध या सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं। सीरिया में 2011 में युद्ध आरंभ होने से पहले वहाँ की साक्षरता दर लगभग छियासी प्रतिशत थी। एक दशक से अधिक के संघर्ष के बाद लाखों बच्चे विद्यालय की दहलीज तक पहुँचने में असमर्थ हैं। जब एक पीढ़ी शिक्षा से वंचित हो जाती है तो उसका प्रभाव केवल उस एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता — अगली दो-तीन पीढ़ियाँ भी उस अंधेरे की छाया में जीती हैं। यह दुष्चक्र तब और भयावह हो जाता है जब यह भी स्मरण हो कि शिक्षा के अभाव में ही कट्टरवाद और उग्रवाद पनपते हैं जो फिर नए युद्धों की भूमि तैयार करते हैं।
आर्थिक दृष्टिकोण से भी युद्ध का विश्लेषण करें तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अप्रैल 2024 में प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में वैश्विक सैन्य व्यय दो हजार चार सौ तैंतालीस अरब अमेरिकी डॉलर के पार पहुँच गया — यह लगातार नौवें वर्ष की वृद्धि थी और 2009 के बाद की सबसे तीव्र वार्षिक बढ़ोतरी थी। इस व्यय में अकेले अमेरिका का हिस्सा नौ सौ सोलह अरब डॉलर रहा, चीन ने लगभग दो सौ छियानवे अरब डॉलर खर्च किए। 2024 में यह आँकड़ा और बढ़कर दो हजार सात सौ अठारह अरब डॉलर तक पहुँच गया। यदि इस धनराशि का एक अंश भी वैश्विक भूख उन्मूलन, स्वच्छ जल की उपलब्धता और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा पर लगाया जाए तो संयुक्त राष्ट्र के कई सतत विकास लक्ष्यों की पूर्ति संभव हो सकती है। यह विरोधाभास मनुष्य की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न उठाता है कि जो संसाधन जीवन बचाने में लगने चाहिए वे जीवन नष्ट करने में खर्च हो रहे हैं।
युद्ध और पर्यावरण का संबंध भी उतना ही चिंताजनक है। आधुनिक युद्धों में प्रयुक्त हथियार, विस्फोटक और रसायन मिट्टी, जल और वायु को दीर्घकालिक रूप से दूषित कर देते हैं। वियतनाम युद्ध के दौरान प्रयुक्त एजेंट ऑरेंज नामक रासायनिक शाकनाशी ने वियतनाम की लाखों एकड़ कृषि भूमि को बंजर बना दिया था और उसके प्रभाव आज भी वहाँ की जनसंख्या में जन्मजात विकलांगता और कैंसर के रूप में दिखाई देते हैं। इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान प्रयुक्त घटे हुए यूरेनियम के गोलों ने वहाँ की भूमि में दीर्घकालिक रेडियोधर्मिता का खतरा छोड़ा है। यूक्रेन में चल रहे युद्ध के कारण यूरोप के सबसे बड़े कृषि क्षेत्रों में से एक बर्बाद हो रहा है — खेतों में बारूदी सुरंगें बिछ गई हैं, नदियाँ प्रदूषित हो गई हैं और जंगल जल रहे हैं। इस पर्यावरणीय विनाश का मूल्य केवल आज की पीढ़ी नहीं, आने वाली कई पीढ़ियाँ चुकाती हैं।
परमाणु युद्ध की संभावना तो समस्त मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए ही प्रश्नचिह्न है। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स के डूम्सडे क्लॉक को जनवरी 2023 में आधी रात से मात्र नब्बे सेकंड पर स्थापित किया गया था — उस संस्था के छिहत्तर वर्षों के इतिहास में यह उस समय का सबसे निकटतम बिंदु था। यह घड़ी प्रतीकात्मक रूप से मानव-निर्मित वैश्विक विनाश की संभावना को दर्शाती है और रूस-यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न परमाणु खतरे के कारण इसे इस स्थान पर रखा गया था। जनवरी 2026 में यह और आगे बढ़कर पचासी सेकंड पर आ गई है — जो इस घड़ी के इतिहास का सर्वाधिक खतरनाक बिंदु है। हिरोशिमा और नागासाकी पर 1945 में गिरे परमाणु बमों ने दो नगरों को भस्म किया था। आज के परमाणु हथियारों की विनाश क्षमता उससे हजारों गुना अधिक है। परमाणु युद्ध की स्थिति में “परमाणु शीतकाल” की जो वैज्ञानिक परिकल्पना है उसके अनुसार धुएँ और राख से ढँकी धरती पर कृषि लगभग असंभव हो जाएगी और अरबों लोग भुखमरी से मरेंगे। इस संदर्भ में यह कहना कि युद्ध-मुक्त विश्व मानव जाति के अस्तित्व की पूर्व-शर्त है — कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक अनिवार्यता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर युद्ध के प्रभावों की चर्चा प्रायः कम होती है किंतु यह पक्ष भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। युद्ध के दौरान और उसके बाद में सैनिकों और नागरिकों में अभिघातज तनाव विकार, अवसाद और आत्महत्या की दर असाधारण रूप से अधिक हो जाती है। युद्ध में बचे नागरिकों — विशेषकर बच्चों — पर यह प्रभाव और भी गहरा होता है। सीरियाई शरणार्थी बच्चों पर हुए अनेक अध्ययनों में पाया गया कि उनमें से बड़ी संख्या मनोवैज्ञानिक आघात के लक्षणों से पीड़ित थी। एक पीढ़ी जो मनोवैज्ञानिक रूप से घायल हो, वह न केवल स्वयं के लिए बल्कि अपनी अगली पीढ़ी के लिए भी स्वस्थ समाज का निर्माण करने में असमर्थ होती है। युद्ध के घाव शरीर पर ही नहीं, मन और समाज के ताने-बाने पर भी पड़ते हैं और वे घाव कई पीढ़ियों तक भरते नहीं।
विस्थापन और शरणार्थी संकट युद्ध की एक और भयावह परिणति है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय की जून 2024 में प्रकाशित ग्लोबल ट्रेंड्स रिपोर्ट के अनुसार 2023 के अंत तक विश्व में ग्यारह करोड़ सत्तर लाख से अधिक लोग जबरन विस्थापित हो चुके थे। यह लगातार बारहवाँ वर्ष था जब यह संख्या बढ़ी थी और एक दशक पहले की तुलना में यह प्रायः दोगुनी हो चुकी थी। इनमें से अधिकांश युद्ध और सशस्त्र संघर्षों के कारण अपनी मातृभूमि छोड़ने को विवश हुए हैं — अफगानिस्तान, सीरिया, वेनेजुएला, यूक्रेन और सूडान से आए शरणार्थी वैश्विक विस्थापन के सबसे बड़े स्रोत बने हुए हैं। विस्थापन केवल घर छोड़ना नहीं है, यह एक पूरी सांस्कृतिक जड़ों का उखड़ना है। इन विस्थापित लोगों की पीढ़ियाँ पहचान के संकट, सामाजिक भेदभाव और आर्थिक वंचना से जूझती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैश्विक विस्थापितों में से पचहत्तर प्रतिशत को निम्न और मध्यम आय वाले देश शरण देते हैं — जिनके पास स्वयं के नागरिकों के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या युद्ध-मुक्त विश्व की परिकल्पना केवल एक आदर्शवादी स्वप्न है या इसे व्यावहारिक धरातल पर भी साकार किया जा सकता है? इतिहास के पन्ने पलटें तो कुछ आशावादी संकेत मिलते हैं। 1945 के बाद यूरोप के देशों के बीच — जो सदियों तक आपस में लड़ते रहे थे — युद्ध लगभग असंभव हो गया। यूरोपीय संघ का निर्माण इस दिशा में मानव इतिहास का सबसे सफल राजनीतिक प्रयोग है। दिसंबर 1948 में कोस्टा रिका के राष्ट्रपति होसे फिगरेस फेरर ने अपनी सेना को संवैधानिक रूप से भंग कर दिया और उस खर्च को शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर लगाया। आज कोस्टा रिका की साक्षरता दर सत्तानवे प्रतिशत से अधिक है, वहाँ सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध है और वह लैटिन अमेरिका के सर्वाधिक स्थिर एवं समृद्ध देशों में गिना जाता है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार सेना भंग करने के बाद कोस्टा रिका की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में उल्लेखनीय सुधार आया। ये उदाहरण बताते हैं कि युद्ध-मुक्त परिवेश कोरी कल्पना नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक विकल्प है।
महात्मा गाँधी ने कहा था कि अहिंसा कायरों का नहीं, वीरों का शस्त्र है। नेल्सन मंडेला ने यह दिखाया कि वार्ता और सत्य-सामंजस्य से गृहयुद्ध और नस्लीय हिंसा का अंत किया जा सकता है। भारत की विदेश नीति की नींव में “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे दर्शन सदा रहे हैं। भारत ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और युद्धों के विरोध में अपनी आवाज़ उठाता रहा है। आज जब विश्व एक बार फिर शीत युद्ध जैसी ध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है, तब भारत जैसे देशों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे संवाद और कूटनीति को बल दें। रूस-यूक्रेन संघर्ष के संदर्भ में यह कहा गया — “यह युद्ध का युग नहीं है” — वह न केवल एक देश की नीति का प्रतिबिंब था बल्कि समस्त मानवता की भावना का प्रतिनिधित्व भी करता था।
युद्ध-मुक्त विश्व का अर्थ केवल सशस्त्र संघर्षों की अनुपस्थिति नहीं है। इसका अर्थ है एक ऐसा विश्व जहाँ संसाधनों का उपयोग विनाश के लिए नहीं, निर्माण के लिए हो। जहाँ वैज्ञानिक प्रतिभा हथियारों की प्रयोगशाला में नहीं, कैंसर की दवा खोजने में लगे। जहाँ अर्थशास्त्री युद्ध का बजट बनाने के बजाय जलवायु परिवर्तन से लड़ने की रणनीति बनाएँ। जहाँ कूटनीतिज्ञ सीमाओं पर तनाव बढ़ाने के बजाय व्यापार और सहयोग की नई राहें खोलें। आज मानवता के सामने जो सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं — जलवायु परिवर्तन, महामारी, गरीबी, असमानता — उनसे लड़ने के लिए वैश्विक एकता और सहयोग की आवश्यकता है जो युद्धों की मानसिकता में संभव नहीं। अंततः यह कहा जा सकता है कि युद्ध-मुक्त विश्व की माँग कोई भावनात्मक आह्वान मात्र नहीं है, यह एक तार्किक अनिवार्यता है। जब तक पृथ्वी पर युद्ध होते रहेंगे, तब तक भूख, बीमारी, अशिक्षा और विस्थापन का उन्मूलन असंभव रहेगा। जब तक खरबों डॉलर हथियारों पर लुटाए जाते रहेंगे, तब तक मानव विकास के लिए पर्याप्त संसाधन कभी नहीं जुट पाएंगे। यदि मानवता इस एक शर्त को पूरा कर ले, तो शेष सभी समस्याओं का समाधान संभव है — और यदि यह शर्त पूरी न हो, तो बाकी सारी उपलब्धियाँ रेत के घर की तरह हैं, जो किसी भी क्षण भरभरा कर गिर सकती हैं।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
