लघुकथा – वारिस
रामखेलावन के पास तीन बीघे ज़मीन थी, एक टूटी खटिया और एक बेटा — रघु। तीनों में सबसे कीमती उसे रघु लगता था।
पर रघु को ज़मीन चाहिए थी। बूढ़े बाप की नहीं, ज़मीन की।
“बाबू, एक बार रजिस्ट्री करवा दो अपने नाम की।”
“अरे, तुम्हीं तो खाओगे बेटा। लेकिन जीते जी क्यों?”
“तो फिर कब? मरने के बाद?”
रामखेलावन चुप हो गया। उस चुप्पी में एक अजीब-सी सिहरन थी, जो उसने महसूस तो की, पर समझा नहीं।
उस रात रघु ने पड़ोसी से उधार लिया — एक लाठी नहीं, एक योजना। सुबह जब मुनीमजी रजिस्ट्री के कागज़ लेकर आए, तब रामखेलावन उन्हें देखने के लिए ज़िंदा नहीं था।
पंचायत बैठी। सरपंच ने रघु की आँखों में देखा।
“रोता क्यों नहीं?”
“आँसू… बाप की मौत के लिए नहीं, ज़मीन रुकने के लिए हैं।”
गाँव सन्न रह गया। ज़मीन अब भी उसी के नाम थी। पर अब वह वारिस था — बाप का नहीं, उसके कातिल का।
जिस घर की नींव खून से सींची जाए, उसमें चैन कभी नहीं बसता।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
