यह युद्ध नहीं, मानवीय मूल्यों पर प्रहार है
रक्तिम आकाश
रोती हुई धरती
खामोश इंसान
टूटे हैं सपने
बिखरे हैं अरमान
सिसकती हवाएँ
नफरत की आग
जलते हुए घर
बुझती उम्मीद
मासूम आँखें
डर से भरी रात
काँपता जीवन
सत्ता का खेल
मानवता हारी
विवेक मौन है
कहाँ गया प्रेम
करुणा की भाषा
खो गया सब कुछ
फिर भी कहीं
दीपक-सी आशा
जलती धीमे
उगेगा सवेरा
शांति की किरण
जीवन मुस्काए
— डॉ. अशोक
