संदेशों के रिश्ते
इस ‘मोबाइल’ की छोटी स्क्रीन में,
अब रिश्तों की दुनिया फिसल गई।
यूं एक “हैप्पी होली” के मैसेज में,
दिल की गर्मी कहीं से सिमट गई।
ऐसे पहले मिलना, हँसना-बोलना,
घर आकर शुभकामनाएँ देना था।
अब एक ‘संदेश-इमोजी’ भेजकर,
सिर्फ़ एक फर्ज़ निभाते रहना था।
ना आवाज़ की वह ‘मिठास’ रही,
ना किसी आँख का अपनापन है।
बदलते डिजिटल दौर के रिश्तों में,
बस, कुछ ‘शब्दों’ का ही बंधन है।
कोई भी तकनीक बुरी नहीं होती,
बस, दिल का रिश्ता खो ना जाए।
संदेशों से परे हो इंसान ख़ुद आए,
एक-दूजे पे प्रेम-स्नेह बरसा जाए।
इन ‘त्योहारों’ की असली खुशियाँ,
सबके ही चेहरों की मुस्कान में हैं।
यूं ‘सच्चे रिश्ते’ वहीं मिला करते हैं,
जहाँ दिलों की पहचान क़ायम हैं।
— संजय एम तराणेकर
