पुस्तक समीक्षा

बी. एल. गौड़ कृत ‘मीठी ईद तथा अन्य कहानियाँ ‘में अभिव्यक्त विविध पक्षों का विश्लेषण

प्रस्तावना

मीठी ईद तथा अन्य कहानियाँ (2021, सजग प्रकाशन, पटपड़गंज, दिल्ली) बी. एल. गौड़ की चौदह कहानियों का एक समृद्ध संकलन है। इन कहानियों की सूची इस प्रकार है — मीठी ईद, गुरु दक्षिणा, प्रतिशोध, त्रिभुज, गुमशुदा, अंतिम हादसा, कल्लो रानी, सौ फुटी सड़क, मनीआर्डर, अमानत, पुल, हेलो, काली मर्सडीज, टूटन।

इस संकलन के प्रस्तावक श्री से. रा. यात्री ने इन कहानियों के बारे में लिखा है कि “इनमें किस्सागोई इनका प्रमुख गुण है” और इनमें “निजत्व की अनुभूति” है जो पाठक को अपनी आपबीती लगती है। लेखक ने स्वयं लिखा है कि उनकी सभी कहानियों के अधिकांश पात्र उन्हें “कहीं न कहीं, किसी न किसी स्थान पर मिले हैं।” यह तथ्य इन कहानियों को जीवन-प्रामाणिकता प्रदान करता है।

इस संकलन की चौदह कहानियों में निम्नलिखित पाँच पक्ष अभिव्यक्त हैं —

क. सामाजिक पक्ष

  1. सांप्रदायिक सद्भाव — मीठी ईद

शीर्षक कहानी मीठी ईद सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है। रेलवे इंजीनियर (उत्तम पुरुष कथावाचक) और कश्मीरी मुस्लिम मजदूर अब्दुल के बीच जो रिश्ता पनपता है, वह वर्ग और धर्म — दोनों की सीमाओं को पार करता है। कहानी के समीक्षक श्री यात्री के अनुसार — “मीठी ईद — यों ऊपर से देखें तो सांप्रदायिक-सौमनस्य की कहानी लगेगी पर नहीं, यह वर्ग-स्तर की गहरी खाई को पाटने वाली और मानवीय संवेदना को गहरे स्तर तक ले जाने वाली रचना है।”

अब्दुल की बीमार पत्नी फातिमा के लिए इंजीनियर का दवा लाना, उसके घर जाकर देखभाल करना, और ईद पर उनके घर जाकर खीर खाना — ये घटनाएँ मानवता की उस भावना को प्रकट करती हैं जो धर्म की दीवारें नहीं जानती। तैंतीस वर्ष बाद भी उस ईद की मधुर स्मृति इंजीनियर के मन में जीवित है — “हर साल मीठी ईद आती है और साथ लाती है अब्दुल और फातिमा की मीठी याद।”

  1. पारिवारिक विघटन और वृद्धावस्था की त्रासदी — गुमशुदा, अनुदान

गुमशुदा कहानी में रामावतार नामक वृद्ध व्यक्ति बेटों के व्यवहार से इतना दुखी और विरक्त हो जाता है कि वह घर छोड़ देता है। वृद्धा पत्नी पुष्पा को भी साथ नहीं ले जाता। यह कहानी आधुनिक भारतीय परिवार में वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा का मार्मिक दस्तावेज है। लेखक ने इस कहानी में एक संदेश भी दिया है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति को आर्थिक रूप से स्वावलंबी रहने का प्रयास करना चाहिए।

अनुदान कहानी इससे भी आगे जाती है। बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले आनंद बाबू को पंद्रह लाख का चेक मिलता है। परंतु ट्रांसपोर्टर बड़ा बेटा कुलदीप उनसे सारा पैसा ट्रकें खरीदने में लगवा देता है और दिवालिया हो जाता है। इसके बाद बेटे अलग-अलग हो जाते हैं, पत्नी टी.बी. से बेलाज चल बसती है। आनंद एक दिन पत्नी की अलमारी में तीस नोट मिलने पर उस धनराशि को लेकर हरिद्वार चले जाते हैं और फिर कभी नहीं लौटते। यह कहानी “वर्तमान समय की त्रासद स्थितियों का ज्वलंत चित्रण” है।

  1. गुरु-शिष्य परंपरा और कृतज्ञता — गुरु दक्षिणा

गुरु दक्षिणा कहानी भारतीय स्वस्थ परंपरा के महान मूल्यों के निर्वाह की कहानी है। प्रोफेसर सदानंद तिवारी के दोनों बेटे अपने-अपने भविष्य को सुरक्षित करने की गरज से झाँसी का पुश्तैनी मकान बेच देते हैं। परंतु उनके शिष्य गजेंद्र — जो साहू जी का बेटा है — अपने गुरु को आजीवन ओरछा का मकान दे देता है। इस कहानी में आज की बाजारी दुनिया में गुरु-दक्षिणा का यह अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। लेखक स्वयं इस प्रसंग का कथावाचक है।

  1. मित्रता की गहराई और मानवीय दायित्व — मनीआर्डर, कल्लो रानी

मनीआर्डर में प्रेमनारायण मिश्र अपने मृत मित्र की पत्नी सुशीला को अपनी पेंशन से हर माह पाँच सौ रुपये का मनीऑर्डर भेजते हैं। यह बात केवल उनकी पत्नी रमा जानती है। कहानी में यह दर्शाया गया है कि मित्रता की गहराई में कर्तव्य-बोध का वह तत्त्व होता है जो व्यक्ति को दशकों तक किसी के प्रति जिम्मेदार बनाए रखता है।

कल्लो रानी में भदौरिया नाम का रेलवे कर्मचारी और उसकी प्रेमिका दीपशिखा की कहानी है। लेखक — जो भदौरिया का मित्र है — चालीस वर्षों के अंतराल के बाद भी उनसे मित्रता निभाता है और उन्हें एक फ्लैट देकर अनिकेत नहीं रहने देता।

  1. बाल-मनोविज्ञान और भागे हुए बच्चे — पुल

पुल कहानी एक भागे हुए किशोर शश्शांक की कहानी है जो जबलपुर से दिल्ली भाग आता है। प्रोफेसर तिवारी उसे यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में पाते हैं और उसकी देखभाल करते हैं। यह कहानी सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है — यह दर्शाती है कि शहरीकरण के युग में अनगिनत बच्चे असुरक्षित हैं और कैसे एक संवेदनशील वयस्क उनके लिए ‘पुल’ की भूमिका निभा सकता है।

  1. प्रेम-विवाह और सामाजिक अस्वीकृति — त्रिभुज, अंतिम हादसा

त्रिभुज में एक अल्पवय किशोरी नीरू अपने माता-पिता के मित्र अधेड़ लेखक-वादक श्रीकांत से प्रेम करती है। विवाहित और दो बच्चों की माँ बन जाने पर भी वह श्रीकांत को भूल नहीं पाती। यह कहानी प्रेम के उस जटिल त्रिकोण को चित्रित करती है जो समाज में अनेक रूपों में विद्यमान है।

अंतिम हादसा में एक युवती को पति द्वारा परित्यक्त होने की पीड़ा है। पति उसे और अल्पायु बेटी को छोड़कर यू.के. चला जाता है।

ख. राजनीतिक पक्ष

  1. नौकरशाही का भ्रष्टाचार और ईमानदार अधिकारी की पीड़ा — मीठी ईद

मीठी ईद में रेलवे इंजीनियर के ट्रांसफर का प्रसंग नौकरशाही की उस राजनीतिक क्रूरता को उजागर करता है जिसमें ईमानदार अधिकारी को ठेकेदार की शिकायत पर दंडस्वरूप स्थानांतरित किया जाता है। यह राजनीतिक सत्य सम्पूर्ण संकलन का एक केंद्रीय स्वर है।

  1. युद्ध की विभीषिका और राजनीतिक हिंसा — प्रतिशोध

प्रतिशोध कहानी राजनीतिक दृष्टि से इस संकलन की सबसे साहसी कहानी है। वियतनाम युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी अमेरिकी सैनिकों द्वारा नूगेन थी (Nugen Thi) के साथ किए गए यौन-अत्याचार और उसके अनोखे प्रतिशोध की गाथा है। अमेरिकी सैनिकों ने विवाह-समारोह में घुसकर नूगेन के गाँव को जला दिया और उसके साथ दुराचार किया। नूगेन ने उस अमेरिकी जवान जॉन की बंदूक से उसकी हत्या कर दी।

इस कहानी में लेखक ने युद्ध की राजनीतिक निरर्थकता पर करारा प्रहार किया है — “किसी भी देश का अहम् और अत्याचार क्यों निरीह नागरिकों को तबाह करता है।”

  1. सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता — पुल, हेलो

पुल कहानी में पुलिस तंत्र की असंवेदनशीलता का चित्रण है। जब प्रोफेसर तिवारी भागे हुए बच्चे शश्शांक को लेकर पुलिस थाने जाते हैं, तो पुलिस का रवैया पहले तो नकारात्मक और अपमानजनक होता है। बाद में संतोष दारोगा का व्यवहार सकारात्मक निकलता है — यह दर्शाता है कि व्यवस्था में कुछ अच्छे लोग भी हैं।

हेलो कहानी में देशबंधु गुप्ता एक सुबह एक अनजान युवती का फोन पाते हैं जो कह रही है — “तुम जो भी हो, मुझे बचा लो, आज यह आदमी मुझे नहीं छोड़ेगा।” गुप्ता जी अपने मित्र रामबीर के साथ मिलकर उस लड़की की जान बचाने की कोशिश करते हैं। यह कहानी पुलिस-तंत्र की जटिलताओं और एक जागरूक नागरिक के नैतिक दायित्व को चित्रित करती है।

  1. काली मर्सडीज — सत्ता और संपन्नता का दर्प

काली मर्सडीज में एक उच्च-शिक्षित परंतु दिशाहीन युवक का वर्णन है जो सुबह-शाम शमशीर सिंह की चट्टी पर बैठता है। यह कहानी उस युवा पीढ़ी की राजनीतिक-सामाजिक दिशाहीनता की कहानी है जो अपनी जड़ों से कट गई है।

ग. आध्यात्मिक पक्ष

  1. ईश्वर में अटूट आस्था — पुल

पुल कहानी का कथावाचक स्पष्ट रूप से घोषित करता है — “चूँकि मैं ईश्वर पर विश्वास करने वाला व्यक्ति हूँ। हर क्षण, हर परिस्थिति में ईश्वर का हस्तक्षेप मानता हूँ। मेरा विश्वास है कि मुझे या किसी भी व्यक्ति को इतना बड़ा कष्ट/संकट बिना प्राराब्ध या वर्तमान के समायोजन के हो ही नहीं सकता।” यह आस्था-दर्शन गौड़ जी की समग्र रचना-दृष्टि का मूल आधार है।

  1. गुरु-भक्ति और कृतज्ञता का दर्शन — गुरु दक्षिणा

गुरु दक्षिणा में साहू जी के बेटे गजेंद्र का अपने गुरु प्रोफेसर तिवारी के प्रति समर्पण केवल सामाजिक कृतज्ञता नहीं — यह एक आध्यात्मिक मूल्य है। साहू जी कहते हैं — “ईश्वर की कृपा से इसके अतिरिक्त मेरे पास तीन मकान और भी हैं। यह मकान तो गजेंद्र का है और वह इसे आपके नाम करवा रहा है।” यह गुरु-दक्षिणा उस भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें गुरु का ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता।

  1. मृत्यु के बाद भी प्रेम की अमरता — मनीआर्डर, सौ फुटी सड़क

मनीआर्डर में मिश्र जी का अपनी मृत पत्नी रमा की स्मृति में जीना — पार्क के किसी पेड़ की ओट में खड़ी दिखाई देती रमा से बातें करना — यह मृत्यु के पार प्रेम की अमरता का एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव है।

सौ फुटी सड़क में नायक चाँद और सितारे के बीच की दूरी को ‘सौ फुटी सड़क’ कहता है — यह रूपक उसके भीतर की उस प्रेमानुभूति का प्रतीक है जो विवाह न होने के बाद भी उसके अस्तित्व का हिस्सा बनी रही। यह आध्यात्मिक प्रेम की वह अवस्था है जहाँ प्रेम संबंध का नहीं, चेतना का विषय बन जाता है।

  1. टूटन — जीवन के अंतिम पड़ाव की आत्म-खोज

टूटन कहानी में जोशी जी अपने अतीत का एक चक्कर लगाकर बारिश के रुकने का इंतजार कर रहे हैं। उनका हर सुबह शमशीर सिंह की चट्टी पर पहुँचना — यह जीवन के अर्थ की उस आध्यात्मिक तलाश का प्रतीक है जो व्यक्ति को अपने जीवन के संध्याकाल में होती है। लेखक के अनुसार — “मुझे लगता है सारी दुनिया जोशी और सुनीता जैसे लोगों से भरी पड़ी है। जिन्हें जरूरत है प्यार की, सम्मान की और अपनेपन की।”

घ. सांस्कृतिक पक्ष

  1. ईद — साझी संस्कृति का प्रतीक

मीठी ईद में ईद का त्योहार केवल मुस्लिम समुदाय का उत्सव नहीं — वह उस साझी संस्कृति का प्रतीक है जहाँ खुशी बाँटी जाती है। हिंदू इंजीनियर का ईद पर अब्दुल के घर जाकर फातिमा की बनाई खीर खाना — यह सांस्कृतिक सहभागिता भारतीय समन्वयवादी संस्कृति की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है।

  1. ओरछा और बेतवा नदी — सांस्कृतिक परिवेश

गुरु दक्षिणा में ओरछा का परिवेश — बेतवा नदी का किनारा, राम राजा मंदिर का अखंड-कीर्तन, पूर्णिमा की चाँदनी — एक गहरा सांस्कृतिक चित्र प्रस्तुत करता है। लेखक लिखता है — “यहाँ के लोग राम को भगवान नहीं मानते बल्कि राजा मानते हैं और चूँकि राम उनके राजा हैं इसलिए वे उनके भगवान भी हैं।” यह एक अनूठी सांस्कृतिक-आस्था की अभिव्यक्ति है।

  1. रेलवे-संस्कृति — भारतीय जन-जीवन का दर्पण

मीठी ईद और कल्लो रानी — दोनों में रेलवे-जीवन की संस्कृति अत्यंत प्रामाणिक रूप से चित्रित है। रेलवे कालोनियाँ, ट्रांसफर की त्रासदी, ठेकेदारी-प्रथा, चेनमैन की संस्कृति — यह सब मिलकर एक ऐसी उपसंस्कृति बनाते हैं जो केवल रेलवे-कर्मियों की अपनी दुनिया है।

  1. दिल्ली की शहरी संस्कृति — पुल, हेलो, अमानत

पुल में यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, हेलो में आनंद विहार-वाशी का परिवेश और अमानत में दिल्ली की सोसायटी-संस्कृति — ये सब दिल्ली की शहरी मध्यवर्गीय जीवन-शैली के प्रामाणिक चित्र हैं। पुल में लेखक बताते हैं कि यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में — “क्रिकेट फुटबॉल, बॉलीबाल, हॉकी, टेनिस, बैडमिंटन, स्केटिंग और तैराकी के लिए भी एक विशाल ताल है।” यह उस दिल्ली का चित्र है जो एशियाई खेलों के बाद बदली।

  1. विदेश में बसे भारतीय — हेलो

हेलो में देशबंधु गुप्ता के बेटे का न्यूयॉर्क में मैनहट्टन में फ्लैट खरीदना और माता-पिता का भारत में अकेलापन — यह उस सांस्कृतिक विडंबना को दर्शाता है जो NRI-संस्कृति ने भारतीय परिवारों में पैदा की है।

ङ. अन्य पक्ष

  1. मनोवैज्ञानिक पक्ष — आंतरिक एकाकीपन

सौ फुटी सड़क की सबसे बड़ी विशेषता उसका मनोवैज्ञानिक आयाम है। नायक एक ऐसी आभासी दुनिया में जीता है जिसमें वह उस लड़की से प्रेम करता है जिससे उसका विवाह नहीं हो सका — परंतु उसी घर में पत्नी और बच्चे भी हैं। यह मनोवैज्ञानिक द्विभाजन — जिसे लेखक ने ‘गुमशुदगी’ कहा है — मानव मन की उस जटिलता को प्रकट करता है जो हर व्यक्ति के भीतर किसी न किसी रूप में उपस्थित है।

  1. स्त्री-विमर्श — पीड़ित और संघर्षशील स्त्री

प्रतिशोध की नूगेन थी, अंतिम हादसा की परित्यक्ता स्त्री, त्रिभुज की नीरू, अमानत की सुमित्रा — ये सभी स्त्री-पात्र अपने-अपने तरीके से पीड़ित हैं। परंतु प्रतिशोध की नूगेन सबसे सशक्त है — वह अपने अत्याचारी पर प्रतिशोध लेती है और राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करती है।

  1. वृद्धावस्था और मृत्यु-बोध — गुरु दक्षिणा, अनुदान, टूटन

गुरु दक्षिणा में प्रोफेसर तिवारी बेतवा के किनारे रात में — अपनी दाढ़ी को आँसुओं से गीली करते — पुराने दिनों को याद करते हैं। टूटन में जोशी जी वर्तमान जीवन में अपनेपन की तलाश में हैं। ये दोनों चित्र वृद्धावस्था की उस मनोदशा को प्रकट करते हैं जब अतीत ही वर्तमान बन जाता है।

  1. आत्मकथात्मक पक्ष — लेखक की सजीव उपस्थिति

इस संकलन का सबसे उल्लेखनीय शिल्पगत पक्ष यह है कि अधिकांश कहानियों में ‘मैं’ (उत्तम पुरुष) के रूप में लेखक स्वयं उपस्थित है। श्री यात्री ने इस पर टिप्पणी की है — “क्योंकि अधिकांश कहानियों में ‘नैरेटर’ के रूप में लेखक उत्तम पुरुष में स्वयं उपस्थित दीख पड़ता है। इसलिए यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि ये कहानियाँ, कहानियों से अधिक संस्मरण हैं।”

  1. मानवीय ऋण और कृतज्ञता का दर्शन

मीठी ईद, मनीआर्डर, कल्लो रानी, गुरु दक्षिणा — इन चारों कहानियों में मानवीय ऋण और कृतज्ञता का एक विशिष्ट दर्शन उभरता है। गौड़ जी का यह मानना है कि मनुष्य अपने जीवन में जो प्रेम, मित्रता और सहायता प्राप्त करता है — उसका ऋण किसी न किसी रूप में लौटाना उसका नैतिक दायित्व है।

अत: यह कहा जा सकता है कि मीठी ईद तथा अन्य कहानियाँ एक ऐसा संकलन है जिसमें जीवन के विविध रंग एक साथ उपस्थित हैं। इसकी चौदह कहानियाँ मिलकर भारतीय समाज का एक व्यापक और प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत करती हैं। सांप्रदायिक सद्भाव से लेकर युद्ध-विरोध तक, गुरु-भक्ति से लेकर वृद्ध-उपेक्षा तक, आत्मीय मित्रता से लेकर एकाकी प्रेम तक — यह संकलन मानव-जीवन के लगभग हर पक्ष को स्पर्श करता है। इस दृष्टि से बी. एल. गौड़ हिंदी कहानी-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय स्थान के अधिकारी हैं।

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330