संभल सको तो संभल
देश से टूट कर प्यार करने वालों के लिए
देश को समझना आसान है,
जो देश को ना समझ पाने की बात करे
वो या तो चालाक या नादान है,
अधिकार बहुतों को पता है
मगर कर्तव्य उनको पता नहीं,
दूर प्रकृति की गोद में रचे बसे
भोले भाले लोगों की खता नहीं,
चालाक और धूर्त
स्वार्थ में पूरी तरह अंधे होते हैं,
गोली वो चलाता जरूर है
पर किसी और के कंधे होते हैं,
इनका फंडा एकदम न्यारा है,
वतन से पहले जेब भरना ही इन्हें प्यारा है,
ये उपद्रव या उन्माद फैला सकते हैं,
शांत पानी में सैलाब ला सकते हैं,
अपने इशारे पर ये दंगे भी फैलाते हैं,
सर पर चोट दे पैरों पर मरहम लगाते हैं,
धन की लालच में अपने आप वो चलते हैं,
देश के दुश्मनों के धृष्ट इशारों पर मचलते हैं,
अरे इस मिट्टी के कण कण से प्यार कर तो देख,
मिला हुआ मौका यूं न फेंक,
बहुत कुछ है जो हमें गर्वित करता है,
हममें गर्व व आत्मविश्वास धरता है,
अपनी लालच की प्यासी नजरिया बदल,
अभी भी मौका है संभल सको तो संभल।
— राजेन्द्र लाहिरी
