कविता

हैवानों का ही बसेरा

इंसानों की बस्ती में, हैवानों का ही बसेरा है
बच के रहना मेरे यारों,यहाँ हर कोई लुटेरा है।

हैवानियत जाग गई है इंसानियत मर चुकी है
ये इंसान नही भेड़िया हैं, आत्मीयता दुखी है।

यहाँ हर कोई सीतमगर है और ये गुनहगार हैं
बेरहमी की भी हद नही,कोई नही मददगार है।

जख्म देने के लिए, हर किसी को इंतजार है
यहाँ कोई नही है अपना, सभी कसूरवार हैं।

मुजरिमों की ये बस्ती है,दंगा-फसाद होता है
यहाँ चैन कहाँ जिंदगी में,यहाँ बर्बाद होता है।

इंसानियत यहाँ सदमे में और सहमा हुआ है
पता नही क्या हों जाए, सोच के डरा हुआ है।

— अशोक पटेल “आशु”

*अशोक पटेल 'आशु'

व्याख्याता-हिंदी मेघा धमतरी (छ ग) M-9827874578