धरा ये कैसा वेश
अतृप्त चाहतों के नाम पर धरा है ये कैसा वेश,
रो रही है मानवता आपस में लड़ रहे जो देश,
खुद के स्वार्थ में कर रहे हैं प्रकृति का नुकसान,
फतेह करना चाहे महत्वाकांक्षाओं का आसमान ।
तोड़ रहे सीमाएं भुलकर भाईचारे का उपदेश,
कोई तो समझाएं उन्हें भेजें शांति का संदेश,
हाथों में थामें खड़े असंख्य परमाणु हथियार,
सभ्य इंसान होकर करें जानवरों सा व्यवहार ।
लूटना चाहते हैं खजाना कौन सा अति विशेष,
क्यों ज़ख्मी कर रहे है बहुरंगी सभ्यता अशेष,
कोहराम मचा रहा आज विश्व में दुखदाई ये खेल,
मौत का तमाशा रचा कौन होगा पास कौन फेल ।
अत्याचार अनाचार अनैतिक अमानवीय आवेश,
ईश तेरे “आनंद” महल में छाया ये कैसा परिवेश,
झूलस रहे क्रोध नफ़रत की आग में आम इंसान,
गंवा रहे है बेकसूर होकर भी मासूम अपनी जान ।
— मोनिका डागा “आनंद”
