मुक्ति की प्रार्थना करें
आओ करें सब “मुक्ति की प्रार्थना”,
तेरह साल से हरीश की हैं “वेदना”।
उनकी साँसें अभी-भी रहीं थीं चल,
कहीं खोई ज़िन्दगी कट रहें थे पल।
माँ रोज़ उसके माथे पे फेरती हाथ,
आशा की चादर बिछा दे रहीं साथ।
पिता की आँखों में हैं तूफ़ानी लहर,
ना जाने कितने बरपा के गए कहर।
क्या? यहीं बाकी जीवन का है अर्थ?
जब हर साँस बन जाए बोझ अनर्थ।
क्या? सिर्फ़ जीना ही यहाँ कर्तव्य है?
हे ईश्वर, क्या? कोमा ही भवितव्य है।
न्यायालय की चौखट पे दर्द आवाज़,
इच्छा मृत्यु को यहाँ मिली हैं परवाज़।
करुणा दीप यूं दर्द के सागर में जला,
पीड़ा की लंबी कैद से आज़ाद चला।
(संदर्भ – सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छा मृत्यु की इज़ाज़त)
— संजय एम तराणेकर
