हास्य व्यंग्य

खट्टा-मीठा : सरेंडर कर दिया

वे बीच चौराहे पर खड़े होकर हाथ फेंक-फेंककर चीख रहे थे- ”सरेंडर कर दिया! सरेंडर कर दिया!!“
मैंने किसी तरह उनको रोककर पूछा- ”किसने सरेंडर कर दिया?“
वे- ”सरकार ने!“
मैं- ”किसको?“
वे- ”ईरान को!“
मैं- ”कैसे?“
वे- ”पता नहीं कैसे, पर कर दिया!“
मैं- ”इससे सरकार को क्या लाभ हुआ?“
वे- ”उनके तेल से भरे जहाज छूट गये। तेल लेकर आ गये!“
मैं- ”तो इसमें हानि क्या है?“
वे- ”सरकार को हानि नहीं है, पर हमें है।“
मैं- ”अरे! कैसे?“
वे- ”ऐसे कि जब सबको तेल और गैस आसानी से मिलने लगेगी, तो लोग सरकार से नाराज नहीं रहेंगे। तो हमें घाटा होगा।“
मैं- ”तो तुम क्या चाहते हो?“
वे- ”हम चाहते हैं कि देश में तेल और गैस की किल्लत इसी तरह बनी रहे, जिससे लोग इस सरकार से नाराज होकर हमें वोट दें। अगर जनता में असन्तोष नहीं फैलेगा, तो हमें कौन पूछेगा?“
मैं- ”तो साले तुम जनता के कष्टों में अपनी राजनीति चमकाने का अवसर ढूँढ़ रहे हो? यानी आपदा में अवसर?“
वे- ”यही समझ लो!“
मेरे मन में आया कि अभी जूते उतारकर इसकी खोपड़ी पर बजा दूँ। सरकार युद्ध से बचे रहकर जनता की समस्याओं को हल करने की पूरी कोशिश कर रही है और यह हरामजादा इसमें अपनी राजनीति चमकाने का मौका खोज रहा है। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया।
वह फिर उसी तरह चिल्लाने लगा- ”सरेंडर कर दिया! सरेंडर कर दिया!!“ मैं उसे चिल्लाता छोड़कर आगे बढ़ गया।

— बीजू ब्रजवासी
चैत्र कृ. ११, सं. २०८२ वि. (१४ मार्च, २०२६)