गीतिका
चार दिन को घर बनाकर
दिल को तोड़ा, दिल में आकर
ज़िंदगी रौशन हुई क्या
क्या मिला दिल को जलाकर
आदतों को क्यों बिगाड़ा
नाज़-नख़रे सब उठाकर
ख़ामुशी हर सू है छायी
धूप पसरी मुँह फुलाकर
एक लमहा भी न गुज़रे
रुक गयी है रात आकर
झील गहरी है ग़मों की
कैसे उभरें पार जाकर
थी जो ‘पूनम’ अब है मावस
तुमने खोया चाँद पाकर
— पूनम माटिया
