कविता

भरोसे

बैठे हैं हिरण
अपनी स्थिति बदलने की आस में
लकड़बग्घों के भरोसे,
उनकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ
सोच रहे नहीं खायेंगे धोखे,
क्योंकि उन्हें बताया गया है कि
हम अब हिंसा छोड़ चुके हैं,
सद्कर्म की ओर रुख मोड़ चुके हैं,
अब तुम्हें नहीं खायेंगे,
तुम्हें संरक्षित मान बचाएंगे,
उधर मृगों के खुलेआम शिकार करने वाले,
बाघ,चिता,भालू,शेर कहते फिर रहे
हमारा हृदय परिवर्तन हो चुका है
अब मृग नहीं बनेंगे हमारे निवाले,
निरीह प्राणियों में अब जग रही
समता समानता बंधुत्व की आस,
वो तैयार बैठे हैं हिंसकों पर करने विश्वास,
जबकि उनके हितैषी
उन्हें समझा रहे बार बार,
कि इन पर भरोसा करना
होगा खतरनाक व बेकार,
मगर इन भोले मनों को कौन समझाए,
इनके आनुवांशिक गुण को
कब और कौन आज तक छुड़ा पाए।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554