मेहंदी
मेहंदी भी जाती है बेटी के
संग ससुराल में
बाबुल की यादों के आंसू कैसे पोंछे
जब लगी हो हाथों में मेहंदी।
जब न होगी बेटियाँ
तो किसे लगायेंगे मेहंदी
होगी बेटियां तब ज्यादा ही रचेगी
जब लगी हो हाथों में मेहंदी।
— संजय वर्मा “दृष्टि”
मेहंदी भी जाती है बेटी के
संग ससुराल में
बाबुल की यादों के आंसू कैसे पोंछे
जब लगी हो हाथों में मेहंदी।
जब न होगी बेटियाँ
तो किसे लगायेंगे मेहंदी
होगी बेटियां तब ज्यादा ही रचेगी
जब लगी हो हाथों में मेहंदी।
— संजय वर्मा “दृष्टि”