प्रज्ञा करूणा और समता
चुपचाप बहती,
ज्ञान की नदी गहरी,
मन को छू ले।
मृदु शब्दों में,
दुखियों का सहारा बने,
करुणा सदा।
समान धूप-छाँव,
सबका अधिकार बराबर,
समता खिलती।
सन्नाटे में भी,
प्रज्ञा की ज्योति जलती,
अंधकार भागे।
हृदय की गहराई,
करुणा की बारिश बहे,
जीवन महकता।
समान दृष्टि से,
सपनों की उड़ान हो,
समता साथ रहे।
ज्ञान का दीपक,
अज्ञानता की रातों में,
प्रज्ञा चमके।
करुणा की छाया,
पीड़ा में शांति दे,
मन शांत रहे।
समान हृदय में,
सबका सुख-समान मिले,
समता अमर रहे।
— डॉ. अशोक
