बिख़री हुई ज़िंदगी, एक अंतहीन तलाश
मानवीय जीवन की विडंबना यह है कि हम इसे हमेशा सहेजने और समेटने की कोशिश में लगे रहते हैं, जबकि इसकी फि़तरत ही बिखर जाना है। ये पंक्तियाँ मेरे दिल को छू गईं,”कहाँ कहाँ से इकट्ठा करूँ तुझे, ऐ ज़िंदगी? जहाँ भी देखता हूँ, तू बिखरी हुई नज़र आती है”केवल शब्द नहीं, बल्कि उस अस्तित्वगत थकान की चीख-पुकार हैं, जो हर इंसान अपने भीतर महसूस करता है। जीवन कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे किसी संदूक में बंद किया जा सके, यह तो समय की बहती धारा है, जो अपने साथ यादों की किरचें, अधूरे ख़्वाबों के मलबे और रिश्तों की कतरनें छोड़ती जाती है। एक इंसान अपनी पूरी उम्र इस कोशिश में लगा देता है कि वह ख़ुद को “मुकम्मल” या पूर्ण कर सके, लेकिन सच्चाई यह है कि जिसे हम ‘पूर्णता’ समझते हैं, वह केवल एक मृगतृष्णा है।
जीवन का यह बिखराव दरअसल उसकी व्यापकता का प्रमाण है। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें बचपन की बेफ़िक्री कहीं और बिख़री मिलती है, जवानी के जोश के निशान किसी और मोड़ पर छूटे होते हैं, और बुढ़ापे की संजीदगी किसी अलग कोने में बैठी नज़र आती है। हमारे दुःख, सुख, सफलताएँ और असफ़लताएँ,,ये सब अलग-अलग दिशाओं में फैले हुए हैं। शायर की यह बेचैनी कि वह इसे कहाँ-कहाँ से इकट्ठा करे, उस जद्दोजहद को दर्शाती है जहाँ मनुष्य अपनी बिखरी हुई पहचान को एक सूत्र में पिरोना चाहता है। हम चाहते हैं कि हमारे सभी प्रियजन एक साथ हों, हमारी सारी उपलब्धियाँ एक ही जगह दिखाई दें और हमारे मन की शांति अखंड बनी रहे, परंतु क़ुदरत का नियम हमें बिखेरता रहता है ताकि हम नए साँचों में ढल सकें।
अंततः जीवन की सार्थकता इसे समेटने में नहीं, बल्कि इसके बिखराव को स्वीकार करने में है। जिस प्रकार आकाश में बिखरे हुए सितारे ही रात को सुंदर बनाते हैं, उसी प्रकार जीवन के ये बिखरे हुए अनुभव ही हमारी शख्सियत को गहराई और रंगत प्रदान करते हैं। यदि ज़िंदगी एक जगह सिमट कर रह जाती, तो इसमें न तो कोई खोज होती और न ही कोई नयापन। यह बिखराव ही हमें यह सिखाता है कि हम हर पल एक नई शुरुआत कर सकते हैं। इन शब्दों में यह संदेश छिपा है कि जीवन को उसकी संपूर्णता में जीने का अर्थ यह नहीं है कि उसे मुट्ठी में क़ैद किया जाए, बल्कि यह है कि उसके हर बिखरे हुए अंश में छिपी सुंदरता और सबक़ को महसूस किया जाए।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
