लघुकथा

जहां चाह, वहां राह

कमलाबाई का नाम पूरे मोहल्ले में बहुत मशहूर था ,कहने को तो वह एक काम वाली थी, चार-पांच घरों में काम करती थी, बर्तन सफाई,झाड़ू पोछा ,कपड़े धोना आदि , लेकिन स्वभाव की इतनी अच्छी थी, कभी नागा नहीं करती थी, समय की पाबंद ,थी और हर किसी से बहुत प्यार से बात करती थी, इसलिए उसकी चर्चा सदा मोहल्ले में रहती थी, हर कोई चाहता था कि वह अपने घर का काम उस से करवा ले ,लेकिन एक बेचारी जान मुश्किल से सुबह 8:00 बजे से लेकर शाम 6:00 बजे तक काम करती थी तब भी चार-पांच घर ही कर पाती थी ,उसका पति भी पहले किसी धागा मिल में काम करता था पर एक दुर्घटना के बाद वह भी अपाहिज हो गया था कुछ पेंशन हर माह आती थी,पर उस से घर का गुजारा नहीं हो सकता था।
एक बेटा था सौरभ लगभग 10 वर्ष का जो कक्षा 5 में पढ़ता था,और एक बेटी अंजलि 12 13 साल की जिसने अभी-अभी आठवीं पास की थी ।
एक दिन कमलाबाई अपनी बेटी से बोली,
बेटी अब तो तूं पढ़ लिख गई है, समझदार है, घर का सारा काम भी कर लेती है तो मेरे साथ चला कर ,हम दो-तीन घर और पकड़ लेंगे तो और ज्यादा कमाई होगी और हमारा घर अच्छे से चल पाएगा , कल को तेरी शादी के लिए भी पैसा चाहिए होगा, हम थोड़ी बचत भी कर लेंगे। अब तो जो पैसा आता है, बड़ी मुश्किल से गुजारा होता है, पर उसकी बेटी को यह मंजूर नहीं था उसने बड़े प्यार से मां को कहा- मैं देखो कितनी पढ़ाई में अच्छी हूं ,अपनी कक्षा आठवीं में प्रथम श्रेणी में पास किया है मैं आगे पढ़ना चाहती हूं और पढ़कर कुछ बनना चाहती हूं।
अगर मैं भी आपके साथ इस काम में लग गई तो हम सारी उम्र यही काम करते रहेंगे और आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
आगे मैंने यह सोचा है कि मैं अपने घर में छोटी क्लास के बच्चों की ट्यूशन लेना शुरू कर दूंगी, उससे भी मेरी अच्छी खासी कमाई हो जाएगी और मेरा पढ़ाई का सारा खर्च भी निकल आएगा।
मैं पूरी मेहनत और लगन से पढ़ूंगी और पढ़ जाऊंगी तो हमारे दिन बदलते कुछ दिन देर नहीं लगेगी।
उसने पिता से भी सलाह की और उसने भी उसकी बात मान ली।
धीरे-धीरे बेटी अंजलि का ट्यूशन का काम अच्छा चल निकला और उसकी भी अच्छी कमाई होने लगी, साथ-साथ उसकी पढ़ाई भी बहुत अच्छी चल रही थी, समय बीतते पता नहीं चला, उसने 10वीं 12वीं और B A भी कर ली।
मेहनत और पढ़ाई के बल पर उसे
B Ed में ही प्रवेश मिल गया और b.ed पास करने के बाद उसे एक सरकारी स्कूल में नौकरी भी मिल गई,
अंजलि का छोटा भाई भी पढ़ाई में होशियार था और अंजलि के बल पर उसने भी 12वीं पास कर ली थी और अब वह इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रहा था।
अंजलि की पढ़ाई लिखाई, उसकी मेहनत , और उसकी समझदारी ने घर के पूरा नक्शा ही बदल दिया था, अब उसकी मां की भी उम्र हो चली थी, उसने भी धीरे-धीरे घरों का काम करना कम कर दिया।
कुछ समय बाद अंजलि की शादी तय हो गई मां ने शादी के लिए अच्छी खासी बचत कर ली थी। बेटा सौरभ भी डिप्लोमा कर कर एक फैक्ट्री में नौकरी में लग गया था, घर के हालात सुधर गए थे और बेटी की शादी भी धूमधाम से हो गई।
पूरी कालोनी वालों में भी अंजलि की शादी में पूरा सहयोग दिया था और बढ़ चढ़ कर शादी में हिस्सा लिया था।
उनके अच्छे स्वभाव के कारण भगवान की भी उन पर इतनी कृपा हुई कि प्रधानमंत्री आवास योजना के अधीन उन्हें एक रहने को घर भी मिल गया था।
जहां चाह है वहां राह, अगर इंसान अपनी पूरी ईमानदारी मेहनत, अच्छे स्वभाव से हर काम मन लगा कर करे, तो कुछ भी असंभव नहीं है।

— जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845

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