बाल कविता

दादा जी

सबसे अच्छे सबसे प्यारे दादा जी।
बस्ती भर में लगते न्यारे दादा जी।
सुबह सवेरे, मुझको नित्य जगाते हैं,
स्वयं भी उठ जाते भिनसारे दादा जी।

भ्रमण हेतु पैदल मुझको ले जाते हैं,
कुछ दूरी पर, नदी किनारे दादा जी।
चुस्त, स्वस्थ हैं, अपने काम स्वयं करते,
रहते किसी के नहीं सहारे दादा जी।

शुद्ध वायु, हरियाली उनको भाती है,
पर्यावरण के हैं हरकारे दादा जी।
मुझसे कहते, खेलों के सम्राट बनो,
बास्केट बाल के रहे सितारे दादा जी।

मुझे पीठ पर बिठलाते, घोड़ा बनते,
जोर से हँसते, खुशी के मारे दादा जी।
शिक्षा के ही साथ, खेल भी आवश्यक,
ज्ञान के बाँट रहे उजियारे दादा जी।

विचलित होते नहीं दुरूह परिस्थिति में,
विपदाओं से कभी न हारे दादा जी।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

117 आदिलनगर, विकासनगर लखनऊ 226022 दूरभाष 09956087585

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