हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – दबाकर खाते हैं

उनको होगी जरूरत मीलों चलने की। खाना पचाने के लिए टहलने की। जो पच्चीस ग्राम खाकर छतों परटहलते है़ं। हम लोग एक साथ टोकरी भर खा लें तब भी लगता है कि अभी कोने में कहीं जगह बाकी है। हमारे यहांँ ट्रेड मिल नहीं साईकिल है। हमारी औरतें वैसे ही जीरों साईज की हैं। खेत बघार से फुर्सत ही नहीं मिलती उनको। क्या फिगर निहारें। हमारे यहांँ ईवनिंग नहीं होता है। हमारे यहांँ साँझ होता है।
हम शुरू से जीरो हैं। माने -मोटा महीने से फर्क नहीं पडता है। जो मिला दबाकर खाते हैं। साग- सत्तुआ सब खा जाते है़ं। हम भात में नमक- तेल सानकर खाते हैं । हम चूजी नहीं हैं। हम सर्वाहारी हैं। मछरी भात भी खा लेते हैं,नून रोटी भी।
हम पराठे नहीं खाते है़। हम दूध -रोटी खाते हैं। हम घी देखकर ना बाबा ना नहीं कहते हैं। ईट्स् अनहेल्दी फाॅर आॅवर बाॅडी नहीं कहते। हम दबाकर खाते हैं , मकूनी। मकूनी माने आलू का पराठा , सत्तू का पराठा। मकई- मडुआ हमारे लिए हेल्दी है। घी में चुभोड़कर हम लोग मकई -मडुआ खाते हैं। सौ – सौ ग्राम मडुआ की रोटी में घी खा जाते हैं।
शकरकंद को आग में पकाकर खाते हैं। सुथनी को पानी में सीझाकर खाते हैं । फिर घँटा भर में भूख लग जाती। हमारे यहाँ पेट पेट नहीं है। इँदारा होता है। इँदरा माने कुँआ। हमारे यहाँ फ्रिज नहीं है। बासी खाना हम नहीं खाते फ्रिज में रखकर। हम खेत से तुरंत का तोड़ा हुआ खाते हैं। शहरों में जीरो फिगर की जरूरत पड़ती होगी।हमारे यहांँ ऐसा आदमी आँधी -पानी में उधिया जाएगा। उधियाना माने उड़ जाएगा। हम लोग शेकर नहीं पीते। हमलोग गुड़ का शरबत पीते हैं। गर्मी में आम का अमझोरा पीते हैं। प्रोटीन के लिए सप्लीमेंट नहीं लेते। मछली- भात , दाल -भात और तरकारी भात छीपा भर भकोस जाते हैं। शूगर, बी.पी. का यहाँ जोर नहीं चलता है। हम घर से खेत में दऊरा -दऊरा गोबर फेंक आते हैं। शूगर, बी. पी., कोलेस्ट्रोल सब मैनेज रहता है।
हमें जोगिंग करने की या ट्रेड मिल पर दौड़ने की जरूरत नहीं पड़ती है । मन- मन भर आनाज खेत से खलिहान तक काट -काट कर पहुँचा देते हैं। मन भर चावल गेंहूँ लेकर मुड़ी पर चल देते हैं। हमें खाना पचाने की जरूरत नहीं पड़ती।, मन भर मतलब चालीस किलो।

— महेश कुमार केशरी

महेश कुमार केशरी

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