मुक्तक/दोहा

दोहांकुर

गिरगिट बोला सांप से, थामो मेरा हाथ।
सदा करेंगे राज हम, अगर रहेंगे साथ।।

कोई जूठन चाटता, कोई छप्पन भोग।
निज कर्मों के लेख ही, भोग रहे सब लोग।।

सीख लिया संसार में, जिसने रहना मस्त।
उसको कर पातीं नहीं, विपदाएं भी त्रस्त।।

जीवटता से ही मिले, जग में नव उत्कर्ष।
सदा फूटतीं कोंपलें, करके ही संघर्ष।।

चूनर सरकी लाज की, टूट गए तटबंध।
मन अनुरागी हो गया, बिखरी प्रेम सुगंध।।

मित्र अगर हो लालची, उससे रखें न मेल।
खा जाती है वृक्ष को, उससे लिपती बेल।।

प्रेमी चाहे प्रेमिका, अंधा चाहे नैन।
चातक स्वाती बूंद को, तरस रहा दिन-रैन।।

सदा दमकती रूपसी, जैसे सोलर प्लेट।
लापरवाही यदि हुई, कर लेगी आखेट।।

एसी – सा ठंडा बदन, मीठी बोल रिमोट।
हैंडल बिद केयर करो, लगे न उसको चोट।।

तन खजुराहो सर्वदा, मन मानस के छंद।
गोदी में प्रतिरूप हो, अवध असल आनंद।।

— डॉ. अवधेश कुमार अवध

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन