लघुकथा

कागज़ की ढाल

डॉ. विनोद शर्मा ने छत्तीस घंटे जागकर परीक्षा दी थी। रैंक आई — 47वीं। सीट नहीं मिली।
जिसे मिली, उसकी रैंक थी — 312वीं। नाम था — सुरेंद्र मेघवाल। उसके पास एक प्रमाण-पत्र था। काफी था।
यह व्यवस्था थी। इसे स्वीकार करना था।
पर जब विनोद ने अपना दुख कहा, तो सुरेंद्र ने कहा —
“तुम्हारे बाप-दादा ने हमारे साथ क्या किया था? भूल गए?”
“मेरे बाप किसान थे। किसी के साथ कुछ नहीं किया।”
“फिर भी तुम सवर्ण हो। तुम्हें भुगतना पड़ेगा।”
विनोद चुप रहा। सुरेंद्र के पिता आईएएस थे। उनके घर में तीन गाड़ियाँ थीं। और फिर भी — प्रमाण-पत्र था।
विनोद ने एक दिन अपनी माँ से पूछा।
“माँ, हम किस जाति के हैं?”
“बेटा, इंसान की।”
“तो क्या यही हमारी गलती है?”
माँ के पास जवाब नहीं था। संविधान के पास था — पर वह जवाब अब हर किसी की ज़रूरत नहीं बना था, सिर्फ़ हथियार बन गया था।
न्याय वह नहीं जो एक को मिले — न्याय वह है जो सबको एक तराज़ू पर तोले।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563