अम्मा रोटी गोल बनाती
अम्मा रोटी गोल बनाती ।
दाल – भात के संग खिलाती।।
गोबर के उपले जलते हैं।
साँझ हुई सूरज ढलते हैं।।
चूल्हे में माँ आग जलाती।
अम्मा रोटी गोल बनाती।।
कभी हरी तरकारी रांधे।
भैंस कभी खूँटे पर बाँधे।।
छत पर धनिया हरा उगाती।
अम्मा रोटी गोल बनाती।।
उठे भोर में पीसे चाकी।
व्यस्त रात -दिन काम न बाकी।।
हर पल फिर भी माँ मुस्काती।
अम्मा रोटी गोल बनाती।।
गाढ़ा-गाढ़ा दही जमाए।
दही मथे फिर छाछ बनाए।।
लवनी सुघर श्वेत उतराती।
अम्मा रोटी गोल बनाती।।
जब पापा जी घर पर आएँ।
अम्मा उनको भोजन लाएँ।।
पंखा झलती उन्हें जिमाती।
अम्मा रोटी गोल बनाती।।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’
