सामाजिक

आत्महत्याओं का दोषी कौन?

समाज में आत्महत्या को कभी भी न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है, किन्तु समाज की जिन विसंगतियों के कारण आजकल इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं उन्हें ठीक करना समाज का दायित्व होना चाहिये।
क्या सुशांत सिंह राजपूत, प्रत्यूषा बनर्जी, जिया खान, नितिन देसाई, समीर शर्मा, कुशल पंजाबी आदि की मृत्यु के लिये सिने जगत के वे भेड़िये जिम्मेदार नहीं हैं जो किसी होनहार कलाकार को पनपने नहीं देते?
क्या शोरूमों और विज्ञापनों की चकाचौंध से अंधे होकर ऐशो आराम की बनावटी ज़िन्दगी जीने के लिये कर्ज़ के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने में उपभोक्तावाद की संस्कृति, क्रेडिट कार्ड और तरह तरह के कर्ज़ देने के धुंआधार विज्ञापन जिम्मेदार नहीं हैं जो हमसे हमारी सादगी और संतुष्टि को छीन रहे हैं?
क्या आजकल युवक, युवतियों में विवाह के उपरांत बढ़ रही आत्महत्या, हत्या और तलाक की घटनाओं के लिये उनके माता- पिता की परवरिश जिम्मेदार नहीं है जिन्होंने बच्चों को बचपन से अच्छे संस्कार नहीं दिये तथा लाड़ प्यार में छूट देकर इतना बिगाड़ दिया कि वो निरंकुश, उद्द्यंड और स्वेच्छाचारी हो गये?
क्या अभिभावकों का अधिक परसेंट लाने का दबाव और प्रतिस्पर्धा में अव्वल आने की लालसा विद्यार्थियों को आत्महत्या के लिये बाध्य नहीं कर रही है?
हम आत्महत्या करने वाले से कोई सहानुभूति न करें किन्तु उन कारणों/ बुराइयों का प्रतिकार इस सभ्य समाज को मिलकर करना होगा जिनके कारण आज होनहार युवा ऐसा जघन्य मार्ग अपना रहे हैं।

— प्रेम चन्द्र शुक्ल

प्रेम चन्द्र शुक्ल

यूको बैंक में प्रबंधक के दायित्व से वर्ष 2011में अवकाश प्राप्त किया 1981 में योग में डिप्लोमा किया 1977 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित नगर व जिला स्तर पर विभिन्न दायित्वों का निर्वहन, वर्तमान में लखनऊ उत्तर भाग में परिवार प्रबोधन का कार्य। पता: एमएम 178, सेक्टर डी, अलीगंज, लखनऊ (226024) चल भाष: 7652045355