लघुकथा

बरसात की रात

काली आँधी, तूफानी बारीश, घनघोर अँधेरा। कड़कड़ाती बिजली, बादलों की गड़गड़ाहट। झमाझम बरसती बूँदे और तेज हवा से महक का छाता बार-बार उलट-पुलट हो रहा था। माँ को तेज बुखार था और बाबूजी लगातार खाँस रहे थे।उनके मना करने पर भी छोटी गुड़िया को ध्यान रखने की हिदायत देकर वह दवाइयाँ लेने चल पड़ी। शाम के सात ही बज रहे थे।लेकिन अँधेरा गहरा था। पासवाली दवाई की दुकान भी बंद थी। डरी-सहमी आशंकाओं से घिरी वह आगे बढ़ रही थी। कोई राहगीर दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा था।डरती सहमती वह आगे बढ़ रही थी। जैसे ही हास्पिटल दिखाई दिया, मन में आशा जगी। वह तेज कदमों से चलने लगी। अब तक उसके कपड़े भीग गए थे। खिलता यौवन और खिल रहा था।

दवाई की पर्ची थमाकर वह इंतजार करने लगी। दुकानदार की उसे घूरती तिरछी नजर देखकर वह सहमी। सोच ही रही थी, अब क्या करूँ? इतने में मोटर साइकिल पर कोई आकर उसके पास रूक गया। उसके बिल्कुल करीब आ गया। जोर से चिल्लाने ही वाली थी कि पड़ोस में रहनेवाले सोमेश को देखकर चुप हो गई। 

” ले ली दवाई? चलो, बहुत देर हो गई तो मासी लड़खड़ाते हुए हमारे घर आई। और तुम्हें ढूँढने के लिए भेजा।”

जिस सोमेश को वह हमेशा बुरा समझती थी, आज उसे देवदूत-सा लगा।

” हां सोमेश, चलो।”

आज सोमेश उसे बड़ा भला लग रहा था। दुकानदार की ललचाई देह चीरती नजर। ओफ्हो! कुछ.भी हो सकता था।”

सोचकर ही दिल सिहर उठा। वह सोमेश को सटकर बैठ गई। 

वह बरसात की रात उसके लिए प्यार की सौगात ले आई।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८