जंतर-मंतर : राजनीति और जन-आक्रोश का ताना-बाना
दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर केवल पत्थरों और चौराहों का एक भूभाग मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की अंतरात्मा का वह मुखर केंद्र है जहाँ सदियों से उपेक्षित, पीड़ित और अधिकारों से वंचित आम नागरिक अपनी उम्मीदों की आख़िरी आस लेकर पहुंचता है। आज जब इस पावन स्थल पर गूंजने वाले आंदोलनों और प्रदर्शनों का गहराई से विश्लेषण किया जाता है, तो सबसे पहले यह सवाल उठता है कि क्या ये पूरी तरह से राजनीतिक लाभ से प्रेरित होते हैं? इस पर यथार्थ यह है कि राजनीति और जन-आक्रोश का यह ताना-बाना बेहद जटिल है,जहाँ एक ओर कुछ अवसरों पर राजनीतिक दल अपनी ज़मीन मज़बूत करने या चुनावी रोटियां सेकने के लिए ऐसे मंचों का परोक्ष या अपरोक्ष उपयोग करते हैं, वहीं दूसरी ओर इन प्रदर्शनों की मूल आत्मा अक्सर उन भीषण वास्तविकताओं,जैसे बेरोजगारी के दलदल में धंसता युवा, महंगाई से त्रस्त गृहणियां, न्याय के लिए दर-दर भटकते किसान और शोषण का शिकार शोषित वर्ग,से उपजी होती है, जिनका किसी राजनीतिक एजेंडे से कोई सरोकार नहीं होता। इसके बावजूद, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब इन जायज़ और ज़मीनी मुद्दों को लेकर जनता सड़कों पर उतरती है, तो हमारा शासन-प्रशासन और कार्यपालिका जवाबदेही से बुरी तरह कतराने लगते हैं, अधिकारी और नीति-निर्माता राजनीतिक आक़ाओं के दबाव में जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित करने के बजाय फ़ाइलों के जाल, लालफ़ीताशाही और टालमटोल की नीतियों के पीछे छिप जाते हैं। संविधान प्रत्येक भारतीय नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सभा करने और अपने विचार व्यक्त करने का पावन अधिकार देता है, जिसका अर्थ है कि जब तक विरोध प्रदर्शन अनुशासित और अहिंसक हैं, तब तक वे पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक दायरे के भीतर आते हैं, और उन्हें कभी भी गैर-कानूनी या राष्ट्र-विरोधी क़रार नहीं दिया जा सकता। परंतु वर्तमान व्यवस्था का यह सबसे काला पहलू है कि जब नागरिक अपने बुनियादी हक़ और न्याय की भीख मांगते हैं, तो क़ानून-व्यवस्था और शांति स्थापना के नाम पर पुलिस प्रशासन द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग, बेरहम लाठीचार्ज और मनमाने ढंग से की जाने वाली गिरफ़्तारियों का सहारा लिया जाता है, क्या अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना कोई ऐसा अपराध है जिसके लिए नागरिकों को दमन का सामना करना पड़े? जब समाज के एक बड़े और मुख़र वर्ग का यह दर्द सड़कों पर जन-आंदोलन का रूप ले लेता है, तब उसे देश की सामूहिक आवाज़ मानने के बजाय सरकार द्वारा साधी जाने वाली लंबी और गहरी चुप्पी न केवल लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की गला घोंटने जैसी है, बल्कि यह सत्ता और आम जनमानस के बीच की खाई को और अधिक चौड़ा करती है। एक स्वस्थ, जीवंत और परिपक्व लोकतंत्र की सबसे बड़ी शर्त यह होती है कि वह अपने नागरिकों के असंतोष को सुने, उसकी तह तक जाकर समाधान ढूंढे और प्रशासन को पूरी तरह जवाबदेह बनाए, क्योंकि संवादहीनता, अहंकार और दमन की नीतियों से कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता, बल्कि इससे जनता का संवैधानिक व्यवस्था से धीरे-धीरे विश्वास उठने लगता है जो राष्ट्रहित में कतई उचित नहीं है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

शान्तिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार सभी को है, परन्तु प्रदर्शन की आड़ में पत्थरबाजी करने और अराजकता फैलाने का अधिकार किसी को नहीं है। इसलिए पत्थरबाजों पर पुलिस का बल प्रयोग करना पूरी तरह वैधानिक है।