कहानी

एक बाप की डायरी

शाम का वक्त था, कमरे में मद्धम रोशनी जल रही थी। मेज़ पर अबू की पुरानी डायरी रखी थी, जिसके सफ़्हात वक्त की गर्द तले दबे हुए थे। अरमान ने जब वो डायरी खोली, तो उसके अंदर छुपा हुआ दर्द उसके सीने में उतरता चला गया,
अरमान हमेशा की तरह अपने कमरे में बैठा अपने दोस्तों के साथ जाने के लिए फोन पर बात कर रहा था। उसे इस माह भी कॉलेज की फ़ीस और दीगर अख़राजत के लिए पैसों की ज़रूरत थी।
वो सीधा अपने अबू के कमरे में गया और बोला, “अबू! इस माह के अख़राजत और फ़ीस के लिए कुछ पैसे चाहिए थे, कल आख़री तारीख़ है।”
मास्टर हबीब ने खांसते हुए अपनी जेब से पर्स निकाला, उसमें से कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकालकर अरमान के हाथ पर रख दिए और नर्मी से बोले, “ये लो बेटा… अपना ख़्याल रखना और पढ़ाई दिल लगाकर करना।”
अरमान ने पैसे पकड़े और बग़ैर यह सोचे कि उस बूढ़े बाप के पास यह रक़म कहाँ से आई है, कमरे से बाहर निकल गया। उसे क्या मालूम था कि उसके बाप की यह मुस्कुराहट कितनी महँगी पड़ रही है।
कुछ ही दिनों बाद, एक अनहोनी हुई,मास्टर हबीब अचानक इस दुनिया से रुख़सत हो गए। घर में कोहराम मच गया। अरमान सदमे की हालत में था, पूरा घर ताज़ियत करने वालों से भरा हुआ था।
तदफ़ीन और रस्म-ए-चहलम के बाद जब अरमान अपने अबू की अलमारी की सफ़ाई कर रहा था, तो उसके हाथ एक पुरानी, फटी हुई डायरी लगी। उसने तजस्सुस के साथ डायरी का पहला सफ़्हा खोला। अंदर अबू की जानी-पहचानी और थकी हुई लिखावट में दर्ज था, “बेटा हर माह अबू से पैसे लेता रहा… मैंने अपनी दवा लेना छोड़ दी थी… ताकि मेरे बेटे की फ़ीस न रुके।”
डायरी का यह जुमला पढ़ते ही अरमान के पैरों तले ज़मीन निकल गई। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया और वहीं फ़र्श पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसे वो तमाम दिन याद आ गए जब वो बिला झिझक पैसे माँगता था और अबू हमेशा मुस्कुराकर दे दिया करते थे।
उसे अब समझ आया कि वो गोलियाँ जो अबू रोज़ाना खाया करते थे, पिछले कई महीनों से क्यों बंद थीं,क्योंकि उन गोलियों के पैसों से उसका मुस्तकबिल संवर रहा था।
कमरा बिल्कुल ख़ामोश था, बस अरमान की सिसकियाँ गूँज रही थीं और दिल ही दिल में वो अपने बाप के सामने शर्मिंदा हो रहा था, यह सोचकर कि… “बाप अक्सर अपनी ज़रूरत नहीं, अपनी औलाद का मुस्तकबिल देखता है…”

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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