साहस
उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई । उसने छल-बल और धन सभी का प्रयोग करके देख लिया । टेबल के नीचे से मिलने वाली सुविधाओं का वह इतना अभ्यस्त हो चुका था कि पारिवारिक संस्कार एवं रिश्तों की मर्यादा भी भूल चुका था। याद आ रहे थे वो पल जब उसने रिहायशी इलाकों में एक सुंदर बंगला खरीदा था। गृह-प्रवेश की पूजा से ज्यादा उसे शानो-शौकत का प्रदर्शन सही लगा था ।
सफलता के उन्माद में बड़े छोटे का लिहाज बिल्कुल भूल गया था । सबके सामने रम की बोतल से पहला ज़ाम पिता जी के हाथों में देना चाहा । पिताजी सख्त स्वर में पहली बार उसे ना कहते हुए चेतावनी दिये थे– “बेटा शिक्षा और संस्कार तो तुम गंवा ही चुके हो एक दिन ऐसा भी आयेगा जब तेरा धन-दौलत मान सम्मान तेरे किसी काम नहीं आयेगा । बिना संघर्ष के अर्जित धन से किसी का भला नहीं हो सकता । अब मेरा इस घर में और तुम्हारे जीवन में मेरे रहने का कोई औचित्य नहीं है।”
यह कहते हुए बाबूजी उसी समय उससे नाता तोड़ लिये थे । उन्हें रोकने का साहस काश वह उस समय जुटा लिया होता तो शायद आज उसे यह दिन देखना नहीं पड़ता ।
— आरती रॉय
